Sunday, 7 October 2012

एक प्रेमगीत -आधा कप चाय और आधा कप प्यार

चित्र -गूगल से साभार 
एक प्रेमगीत -आधा कप चाय और आधा कप प्यार 
आधा कप 
चाय और 
आधा कप प्यार |
चुपके से 
आज कोई 
दे गया उधार |

सांकल को 
बजा गयी 
सन्नाटा तोड़ गई ,
यादों की 
एक किरन 
कमरे में छोड़ गई ,
मौन की 
उँगलियों से 
छू गया सितार |

सम्मोहन 
आकर्षण 
मोहक मुस्कान लिए ,
तैर गई 
खुशबू सी 
वो मगही पान लिए ,
लहरों ने 
तोड़ दिया 
अनछुआ कगार |

परछाई 
छूने में 
हम हारे या जीते ,
सूरज के 
साथ जले 
चांदनी कहाँ पीते ,
अनजाने में 
मौसम 
दे गया बहार |

वृन्दावन 
होता मन 
गोकुल के नाम हुआ ,
बोझिल 
दिनचर्या में 
एक सगुन काम हुआ ,
आना जी 
आना फिर 
वही शुक्रवार |

जीवन का 
संघर्षों से 
वैसे नाता है ,
कभी -कभी 
लेकिन यह 
प्रेमगीत गाता है ,
कभी यह 
वसंत हुआ 
कभी रहा क्वार |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, 4 October 2012

एक गीत -अपना दुःख कब कहती गंगा

हर की पैड़ी हरिद्वार -चित्र गूगल से साभार 
भूगोल की किताबों में भले ही गंगा को नदी लिखा गया हो |दुनिया की किंवदन्तियों में भले ही इसे नदी माना जाता  हो | लेकिन पौराणिक आख्यानों में इसे देवी का दर्जा प्राप्त है |गंगा हमारे लिए माँ है ,यह भारत की जीवन रेखा है |एक गंगा धरती पर बहती है दूसरी हमारी आस्थाओं में प्रवाहमान है |धरती की गंगा भले ही एक दिन हमारे कुकर्मों से हमारी आँखों से हमेशा के लिए ओझल हो जाये या उसका अस्तित्व समाप्त हो जाये |लेकिन  हमारी आस्था में प्रवाहमान गंगा कभी खत्म नहीं होगी |लेकिन क्या सिर्फ़ हमें आस्था में ही गंगा चाहिए या वास्तविकता में |गंगा जैसी औषधीय गुण वाली नदी इतनी खराब स्थिति में क्यों पहुँच गयी |हम अपनी नदियों की पवित्रता क्यों नहीं बचा पा रहे हैं |क्या हम सिर्फ़ सरकार पर दोष मढ़कर बच सकते हैं |हम दुनिया के अन्य देशों की तरह अपनी नदियों को साफ सुथरा क्यों नहीं रख सकते हैं |हमें धार्मिक मान्यताओं की जकड़न से मुक्त होकर गंगा में कूड़ा -कचरा ,माला -फूल ,मूर्ति विसर्जन नहीं करना चाहिए |सरकार तो जिम्मेदार है ही हम कम जिम्मेदार नहीं हैं |अब वक्त आ गया है हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हमें जीवनदायिनी नदियाँ चाहिए या गाद या मलबा |जिन नदियों के किनारे हमारे प्राचीन नगर बसे ,जिनके किनारे हमारी सभ्यताएं विकसित हुईं जिनकी छाँव में हमारी परम्पराएँ विकसित हुईं हम उनके प्रति इतने चुप क्यों हैं ,उदासीन क्यों हैं |कुछ आप सब भी सोचिये कुछ सरकार को भी सोचना चाहिए |

एक गीत -अपना दुःख कब कहती गंगा 
स्वर्ग छोड़कर 
चट्टानों में ,
वीरानों में बहती गंगा |
दुनिया का 
संताप मिटाती 
खुद कितने दुःख सहती गंगा |

रहे पुजारिन 
या मछुआरिन 
सबसे साथ निभा लेती है ,
सबके 
आंचल में सुख देकर 
सारा दर्द चुरा लेती है 
आंख गड़े 
या फटे बिवाई 
अपना दुःख कब कहती गंगा |

चित्रकार ,
शिल्पी माँ तेरी 
छवियाँ रोज गढ़ा करते हैं ,
कितने काशी 
संगम तेरे 
तट पर मंत्र पढ़ा करते हैं ,
सागर से 
मिलने की जिद में 
दूर -दूर तक दहती गंगा |

गाद लपेटे 
कोमल तन पर 
थककर भी विश्राम न करती ,
अभिशापित 
होकर आयी हो 
या तुमको प्रिय है यह धरती ,
कुछ तो है 
अवसाद ह्रदय में 
वरना क्यों चुप रहती गंगा |

तेरे जल में 
राख बहाकर 
कितने पापी स्वर्ग सिधरते ,
तेरी अमृतमय 
बूंदों से 
हरियाली के स्वप्न उभरते ,
जो भी डूबा 
उसे बचाती 
खुद कगार पर ढहती गंगा |
चित्र -गूगल से साभार 

Monday, 1 October 2012

एक गज़ल -गाँधी जयंती पर

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी 
एक गज़ल 
कुदरत का करिश्मा हैं या वरदान हैं गाँधी

कुदरत का करिश्मा हैं या वरदान हैं गाँधी
इस दौर में इंसा नहीं भगवान हैं गाँधी 

अफ़साना -ए -आज़ादी के किरदार कई हैं 
अफ़साना -ए -आज़ादी का उनवान हैं गाँधी 

जन्नत से अधिक पाक है इस देश की मिट्टी 
इस देश की मिट्टी में ही कुर्बान हैं गाँधी 

ता उम्र रहे सत्य अहिंसा के पुजारी 
हर मुल्क में इस देश की पहचान हैं गाँधी 

मजहब से बहुत दूर वो इंसान थे पहले 
ईसाई हैं ,हिन्दू हैं ,मुसलमान हैं गाँधी 

Saturday, 22 September 2012

गज़ल -किसी बच्चे को इक टॉफी थमा दो फिर हँसी देखो

चित्र -गूगल से साभार 
किसी बच्चे को इक टॉफी थमा दो फिर हँसी देखो 
किताबों में नहीं लिक्खा है ये सच है अभी देखो 
किसी बच्चे को इक टॉफी थमा दो फिर हँसी देखो 

अगर रंजिश भी है तो फैसले करिए  मोहब्बत से 
किसी मजदूर के गुस्से में उसकी बेबसी देखो 

रसोईघर के चूल्हों को बुझा देने की है साजिश 
हुकूमत  की मोहब्बत और हमसे आशिकी देखो 

समन्दर को बड़ा कहते हैं सब ,पर मैं नहीं कहता 
कई दरिया का जल पीता है उसकी तिश्नगी देखो 


मुखालिफ़ मौसमों में ये धुँआ ,कालिख नहीं देखो 
अँधेरे में मशालों में है कितनी रौशनी देखो 

वो इक बूढ़ा जिसे बच्चे अकेला छोड़ देते हैं 
सफ़र में जब कभी गिरता उठाते अजनबी देखो 

किसी चश्में से मैं देखूँ हमेशा वो नज़र आये 
मेरी गज़लों से उसके हुस्न  की बाबस्तगी देखो 

शहर का फूल है खुशबू भी उसकी गर्द ओढ़े है 
मेरी बस्ती के फूलों में हमेशा ताज़गी देखो 
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, 16 September 2012

राजनीति के इस अरण्य में कितने आदमखोर हो गए

चित्र -गूगल से साभार 
एक नवगीत -राजनीति के इस अरण्य में 
पढ़ते -पढ़ते 
आप, और हम 
लिखते -लिखते बोर हो गए |
राजनीति के 
इस अरण्य में 
कितने आदमखोर हो गए |

पाँव तले 
शीशों की किरचें 
चेहरों पर नाख़ून दिख रहे ,
अदब घरों में 
तने असलहे 
फिर भी हम नवगीत लिख रहे ,
कटी पतंगें 
कब गिर जाएँ 
हम मांझे की डोर हो गए |

अख़बारों 
के पहले पन्ने 
उनके जो बदनाम हो गए ,
कालजयी 
कृतियों के लेखक 
कलाकार गुमनाम हो गए ,
काले कौवे 
हंस बन गए 
सेही वन के मोर हो गए |

गिरते पुल हैं 
टूटी सड़कें 
प्रजातंत्र लाचार हो गया ,
राजनीति 
का मकसद सेवा नहीं 
सिर्फ़  व्यापार हो गया ,
क्रांतिकारियों 
के वंशज हम 
अब कितने कमजोर हो गए |

मुखिया ,
मौसम हुए सयाने 
खुली आँख में धूल झोंकते ,
हम सब तो 
असमंजस बाबू 
पांच बरस पर सिर्फ़ टोकते ,
साथी 
सूरज बनना होगा 
अन्धेरे मुँहजोर हो गए |

Monday, 10 September 2012

एक प्रेमगीत -तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता

चित्र -गूगल से साभार 
तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता 
तुम्हारे 
नहीं होने पर 
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से 
शाम मैं 
खामोशियों में जागता -सोता |

तुम्हारे 
साथ पतझर में 
भी  जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते 
धुँए सा सिगरेट के, 
अब  चाँद दिखता  है ,
भरे दरिया में 
भी लगता है 
जैसे जल नहीं होता |

नहीं हैं रंग 
वो स्वप्निल 
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे 
फूल में खुशबू 
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में 
कोई खोया हुआ 
बच्चा दिखा रोता |

मनाना 
रूठना फिर 
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में 
मोहब्बत का 
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर 
का भारी  बोझ 
अब कोई नहीं ढोता |

किचन भी 
हो गया सूना 
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर 
कोई कविता नहीं 
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं 
खूंटियों पर अब 
कोई कपड़े नहीं धोता |


खिड़कियों से 
डूबता सूरज 
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों 
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ 
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, 5 September 2012

एक गीत -महाप्राण निराला को समर्पित -ओ सदानीरा निराला के सुनहरे गीत गाना

महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला 
एक गीत -महाप्राण निराला को समर्पित -
ओ सदानीरा निराला के सुनहरे गीत गाना 
पर्वतों की 
घाटियों से 
जब इलाहाबाद आना |
ओ सदानीरा !
निराला के 
सुनहरे गीत गाना |

आज भी 
'वह तोड़ती पत्थर '
पसीने में नहाये ,
सर्वहारा 
के लिए अब 
कौन ऐसा गीत गाये ,
एक फक्कड़ 
कवि हुआ था 
पीढ़ियों को तुम बताना |

'राम की थी 
शक्ति पूजा '
पर निराला गा रहे हैं ,
उस कथानक 
में निराला 
राम बनकर आ रहे है ,
अर्चना में 
कम न हो जाएँ 
कमल के फूल लाना |

आज भी है 
वहीं दारागंज 
संगम के किनारे ,
वक्त की 
लहरें मिटाकर 
ले गयीं पदचिन्ह सारे ,
ओ गगन 
जब गर्जना तो 
वही 'बादल राग 'गाना |

पूर्णिमा के 
ज्वार सा मन ,
वक्ष में आकाश सारा ,
वह 
इलाहाबाद का 
उसको इलाहाबाद प्यारा ,
मुश्किलों 
में भी न छोड़ा 
काव्य से रिश्ता निभाना |


वक्त  की 
पगडंडियों पर 
वह अकेला चल रहा था ,
आँधियों में 
एक जिद्दी दीप 
बनकर जल रहा था ,
जानते हैं 
सब  बहुत पर 
आज भी  वह कवि अजाना |

गोद बासन्ती 
मिली पर 
पत्थरों के गीत गाया ,
फूल 
साहूकार ,सेठों 
की तरह ही नज़र आया ,
छन्द तोड़ा 
मगर उसको 
छन्द आता था सजाना |
चित्र -गूगल से साभार 

Monday, 3 September 2012

एक गीत -प्यार के हम गीत रचते हैं

चित्र -गूगल से साभार 
प्यार के हम गीत रचते हैं इन्हीं कठिनाइयों में
खिल रहा है 
फूल कोई 
धान की परछाइयों में |
सो रहे 
खरगोश से दिन 
पर्वतों की खाइयों में |

ज्वार पर 
देखो समय के 
गीत पंछी गा रहे हैं ,
बादलों के 
नर्म फाहे 
चाँद को सहला रहे है ,
देखकर 
तुमको यहीं हम 
खो गए पुरवाइयों में |

हलद 
बांधे चल रहा 
मौसम हरे रूमाल में ,
लगे हैं 
खिलने गुलाबी-
कँवल मन के ताल में ,
साँझ ढलते 
मन हमारा 
खो गया शहनाइयों में |

कास -बढ़नी 
को लगे फिर 
चिठ्ठियाँ लिखने उजाले ,
आँख पर 
सीवान के 
चश्में चढ़े हैं धूप वाले ,
एक आंचल 
इत्र भींगा 
उड़ रहा अमराइयों में |

झील की 
लहरें नहाकर 
रेशमी लट खोलती हैं ,
चुप्पियों 
के वक्त भी 
ऑंखें बहुत कुछ बोलती हैं ,
प्यार के 
हम गीत 
रचते हैं इन्हीं कठिनाइयों में |
चित्र -गूगल से साभार 

Saturday, 1 September 2012

एक गज़ल -ये बात और है ये धूप मुझसे हार गई

चित्र -गूगल से साभार 
ये बात और है ये धूप मुझसे हार गई 
जबान होते हुए भी जो बेजुबान रहे 
हमारे मुल्क में ऐसे ही हुक्मरान रहे 

जो मीठी झील में मछली पकड़ना सीख गए 
परों के रहते परिन्दे वो बे -उड़ान रहे 

ये बात और है ये धूप मुझसे हार गई 
मगर दरख़्त कहाँ मेरे सायबान रहे 

महल हैं उनके जिन्हें नींव का पता ही नहीं 
मकां बनाया जिन्होंने वो बे -मकान रहे 

मैं फेल होने के डर से हयात पढ़ता रहा 
मेरे सफ़र में हमेशा ही इम्तिहान रहे 

पतंगें रख के उड़ाना ही उनको भूल गया 
मेरे शहर में धुंए वाले आसमान रहे 

वो इक शिकारी था छिपकर शिकार करता रहा 
शरीक- ए- ज़ुर्म थे हम भी कि इक मचान रहे  

कुतुबमीनार पे चढ़कर वो हमको भूल गए 
हम उनके वास्ते सीढ़ी के पायदान रहे 

हमारे सिर पे जरूरत का बोझ था इतना 
बुजुर्ग देह के भीतर भी  नौजवान रहे 

हम अपनी जंग सरहदों पे कभी हारे नहीं 
घरों की जंग में अक्सर लहूलुहान रहे 
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, 22 August 2012

एक गज़ल -आराकशी को आप हुनर मत बनाइये

चित्र -गूगल से साभार 
एक गज़ल -आराकशी को आप हुनर मत बनाइये 

आराकशी को आप हुनर मत बनाइये 
जंगल तबाह करके शहर मत बनाइये 

लौटेंगे शाम होते ही पंछी उड़ान से 
इन घोंसलों को फूँक के घर मत बनाइये 

ताज़ा हवा ,ये फूल ,ये खुशबू न छीनिए 
मुश्किल हमारा और सफ़र मत बनाइये 

ईजाद यूँ तो नस्लें नई कीजिये मगर 
बौना हो जिसका कद वो शज़र मत बनाइये 

पत्थर में भी हुनर  है तो तारीफ़ कीजिये 
जेहनों को इतना तंग नज़र मत बनाइये 

बस्ती ये पुर सुकून है दिल्ली में ही रहें 
अपना निवास आप इधर मत बनाइये 

काला धुआं है सिर्फ़ तरक्की के नाम पर 
वातावरण को आप ज़हर मत बनाइये 

इनका तो काम प्यास बुझाना है दोस्तों 
नदियों के दरमियान गटर मत बनाइये 

ख़बरों की असलियत का पता कुछ हमें भी है 
शोहरत के वास्ते ही ख़बर मत बनाइये 
चित्र -गूगल से साभार 

एक पुरानी ग़ज़ल -पत्रा में लग्न खूब थे

  चित्र साभार गूगल  एक पुरानी ग़ज़ल - पत्रा में लग्न खूब थे  सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की  फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की  पत्रा ...