Tuesday, 18 May 2010

एक बुरुंश कहीं खिलता है

हरीश चन्द्र पाण्डे (जन्म २८-१२-५२)
आवास- ए-११४, गोविन्दपुर कालोनी, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- ०९४५५६२३१७६ (09455623176)

समकालीन हिन्दी कविता में हरीश चन्द्र पाण्डे एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अस्सी के दशक में समकालीन कविता में जिन महत्वपूर्ण कवियों ने पहचान बनायी उसमें हरीश चन्द्र पाण्डे का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) की सुरम्य पहाडि यों ने हिन्दी साहित्य और देश को कई महत्वपूर्ण साहित्यकार दिये हैं जिनमें प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत, इलाचन्द्र जोशी, गौरापंत शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी, पंकज बिष्ट और मृणाल पाण्डे प्रमुख हैं। बुरुंश के खूबसूरत और चटख रंगों वाली शांत और सुरम्य अल्मोड़ा घाटी में (सदी गांव द्वारा हाट) २८-१२-१९५२ को हरीश चन्द्र पाण्डे का जन्म हुआ। पाण्डे जी की स्कूली शिक्षा अल्मोड़ा और पिथौरागढ  में हुई और कामर्स में स्नातकोत्तर की शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश से पूर्ण हुई। हरिशचन्द्र पाण्डे की कविताएं देश की खयातिलब्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पाण्डे जी की कविताओं में कन्टेन्ट की ताजगी और कहन की शैली दोनों स्तरीय होते हैं। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है यथा- अंग्रेजी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी तथा उर्दू। अब तक हरीश चन्द्र पाण्डे को सोमदत्त पुरस्कार (१९९९), केदार सम्मान (२००१), ऋतुराज सम्मान (२००४), हरिनारायण व्यास सम्मान (२००६) आदि कई महत्वपूर्ण सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। पाण्डे जी की महत्वपूर्ण काव्य कृतियां हैं - ''कुछ भी मिथ्या नहीं है'', ''एक बुरुंश कहीं खिलता है'', ''भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं'' और 'असहमति (प्रकाशनाधीन)। स्वभाव से सहज और सौम्य व्यक्तित्व के धनी कवि हरीश चन्द्र पाण्डे सम्प्रति महालेखाकार कार्यालय इलाहाबाद में वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। हम इस कवि की दो कविताएं अपने सभी पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं -



एक बुरूंश कहीं खिलता है

खून को अपना रंग दिया है बुरूंश ने

बुरूंश ने सिखाया है
फेफड़ों में भरपूर हवा भर कर
कैसे हंसा जाता है

कैसे लड़ा जाता है
ऊंचाई की हदों पर
ठन्डे मौसम के विरुद्ध

एक बुरूंश कहीं खिलता है
खबर
पूरे जंगल में आग की तरह फैल जाती है

आ गया है बुरूंश
पेड़ो में अलख जगा रहा है
उजास और पराक्रम के बीज बो रहा है
कोटरों में

बुरूंश आ गया है
जंगल के भीतर एक नया मौसम आ रहा है


२- देवता

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इन्कार कर दिया

आदमी ने उसे
देवता बना दिया

Sunday, 9 May 2010

एक गीत -मां तुम गंगाजल होती हो

एक गीत -माँ तुम गंगाजल होती हो 
मेरी ही यादों में खोयी
अक्सर तुम पागल होती हो
मां तुम गंगा जल होती हो!
मां तुम गंगा जल होती हो!

जीवन भर दुःख के पहाड़ पर
तुम पीती आंसू के सागर
फिर भी महकाती फूलों सा
मन का सूना सा संवत्सर
जब-जब हम लय गति से भटकें
तब-तब तुम मादल होती हो।

व्रत, उत्सव, मेले की गणना
कभी न तुम भूला करती हो
सम्बन्धों की डोर पकड  कर
आजीवन झूला करती हो
तुम कार्तिक की धुली चांदनी से
ज्यादा निर्मल होती हो।

पल-पल जगती सी आंखों में
मेरी खातिर स्वप्न सजाती
अपनी उमर हमें देने को
मंदिर में घंटियां बजाती
जब-जब ये आंखें धुंधलाती
तब-तब तुम काजल होती हो।

हम तो नहीं भगीरथ जैसे
कैसे सिर से कर्ज उतारें
तुम तो खुद ही गंगाजल हो
तुमको हम किस जल से तारें।
तुझ पर फूल चढ़ायें कैसे
तुम तो स्वयं कमल होती हो।

Friday, 7 May 2010

गजल : वो एक खत है

चित्र -गूगल से साभार 


एक गज़ल -वो चुप रहे खुदा की तरह 

उसी के कदमों की आहट सुनाई देती है
कभी-कभार वो छत पर दिखाई देती है

मैं उससे बोलूं तो वो चुप रहे खुदा की तरह
मैं चुप रहूं तो खुदा की दुहाई देती है

वो एक खत है जिसे मैं छिपाये फिरता हूं
जहां खुलूस की स्याही दिखाई देती है

तमाम उम्र उंगलियां मैं जिसकी छू न सका
वो चूड़ी वाले को अपनी कलाई देती है

वो एक बच्ची खिलौनों को तोड  कर सारे
बड़े सलीके से मां को सफाई देती है

जयकृष्ण राय तुषार

विश्व राजनेता मोदी जी

माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार  श्री नरेंद्र मोदी जी  मोदी जी अब विश्व नेता बन चुके हैं-भारत की अलग पहचान बनाने वाले प्रधानमंत्री फिर विकास ...