Wednesday, 25 November 2020

एक गीत-नए वर्ष की नई सुबह अब साँसो पर पहरे मत लाना |


 

एक गीत-नए वर्ष की नई सुबह 

अब साँसों पर पहरे मत लाना

नए वर्ष की 

नई सुबह 

अब साँसो पर पहरे मत लाना |

चुभन सुई की

सह लेंगे पर

दर्द बहुत गहरे मत लाना ।


सारे रंग -गंध

फूलों के

बच्चों को बाँटना तितलियों ।

फिर वसंत के

गीत सुनाना

वंशी लेकर सूनी गलियों,

बीता साल

भुला देंगे हम

अब मौसम बहरे मत लाना ।


तारीख़ें शुभ

मंगल दिन हो

झीलों में अमृत सा जल हो,

जीवन की गति

हिरनी जैसी

वातायन की धुन्ध विरल हो,

प्रकृति तोड़ दे

घुँघरू अपने

ऐसे अब खतरे मत लाना ।


कण-कण में हो

रंग-रंगोली

दरपन में श्रृंगार भरा हो,

कविताओं के दिन

फिर लौटें 

स्वर कोई भी नहीं डरा हो ,

मीठे फल ताजा

पेड़ों से लाना

पर कुतरे मत लाना ।


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 



कवि-चित्र -साभार गूगल 




Saturday, 19 September 2020

एक आस्था का गीत - जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम

 



एक आस्था का गीत -
जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम  

जहाँ वंशी गूँजे हर शाम |
किशोरी जी का जो छवि धाम 
जहाँ पर कृष्ण रूप में राम !
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ भगवान भक्त के दास 
सूर ,वल्लभ ,स्वामी हरिदास ,
जहाँ राजा से रंक का मेल 
सुदामा कृष्ण का सुंदर खेल ,
जहाँ यमुना का क्रीड़ाधाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ बस प्रेम है द्वेष न राग 
जहाँ हर मौसम होली ,फाग ,
जहाँ फूलों में इत्र सुवास 
जहाँ उद्धव जी का परिहास ,
जहाँ संतो का सुख हरिनाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ गीता का अमृत पान 
गोपियों का नर्तन -मधु गान ,
जहाँ मिट जाते दुःख -संताप 
पुण्य का उदय ,अस्त हो पाप ,
है जिसके वश में माया ,काम 
वही है वृंदावन का धाम |

जहाँ गिरि गोवर्धन का मान 
इन्द्र का टूटा था अभिमान ,
जहाँ गायों का पालनहार 
जहाँ भक्तों के मोक्ष का द्वार 
जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम
वही है वृन्दावन का धाम |


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 


सभी चित्र -साभार गूगल 

Friday, 18 September 2020

एक भक्ति गीत -समस्त देवियों शक्तिपीठों को समर्पित

 


एक भक्ति गीत -देवी गीत 

जय माँ विंध्यवासिनी ,काली 
अष्टभुजा महरानी |
गंगा मैया द्वार तुम्हारे 
बहती  हे कल्यानी  |

पर्वत ,खोह ,नदी ,सागर में 
तेरी ज्वाला जलती ,
ज्ञान ,मन्त्र या तंत्र नहीं
माँ सिर्फ़ भक्ति से मिलती ,
कालिदास बन गया 
तुम्हारी महिमा से अज्ञानी |

तुम्ही हो मंशा, वैष्णो देवी 
तुम्हीं हो मैहर वाली ,
सती ,भवानी ,दुर्गा माता 
कलकत्ते की काली ,
कामरूप की कामख्या माँ 
अष्टसिद्धि की दानी |

सीता ,लक्ष्मी ,पार्वती तुम 
अन्नपूर्णा कहलाती ,
गीत, कला ,संगीत सुकोमल 
ब्रह्माणी सिखलाती ,
जिस पर हुई तुम्हारी महिमा  
परमहंस वह ज्ञानी |

शंख ,चक्र और गदा 
शीश पर स्वर्णिम मुकुट सुहाए  ,
चरण तुम्हारे चढ़ा भक्ति का 
फूल नहीं मुरझाए ,
शैलसुता तुम विश्वस्वरूपा 
मैया हो वरदानी |


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र -साभार गूगल माँ विंध्यवासिनी देवी ,माँ कामख्या देवी 

Tuesday, 28 July 2020

एक आस्था का गीत -कलियुग का उद्धार करेंगे त्रेता के श्रीराम




एक आस्था का गीत -
कलियुग का उद्धार करेंगे त्रेता के श्री राम  

स्वर्ग से सुन्दर बने अयोध्या 
सरयू पावन  धाम |
कलियुग का उद्धार करेंगे 
त्रेता के श्री राम |

जन -जन केवट बनकर आये 
प्रभु को पार लगाने ,
फिर से आये राम 
हमारा सोया देश जगाने ,
साधु  ,संत ,सिद्धों ने मिलकर 
किया क्रांति का काम |

प्रभु के पावन मन्दिर खातिर 
अनगिन नैन पियासे ,
इस अभिजित मुहूर्त के खातिर 
सुन्दर शिला तराशे ,
हनुमत प्रमुदित यह तन आये 
फिर से प्रभु के काम |

हवा बह रही केसर जैसी 
माटी बन गयी चंदन ,
राम सिया के चरण पड़े 
जिस वन में हो गया नंदन ,
प्रभु की मूरत जहाँ वहीं है 
धरती का सुख धाम |

एक सनातन ज्योति धर्म की 
सभी दिए में जलती ,
एक ज्योति तुलसी बाबा की 
रामकथा में मिलती ,
श्रृंगवेरपुर ,चित्रकूट, हर
शिला  जपे प्रभु नाम |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र -साभार गूगल 


Sunday, 12 July 2020

एक गीत -नींद से कहना न टूटे

चित्र साभार गूगल

एक गीत-नींद से कहना न टूटे

हँस रही
इन घाटियों के
माथ पर बिंदी हरी है ।

नींद से
कहना न टूटे
स्वप्न में इक जलपरी है ।

झील में
वंशी बजाते
गिन रहा है लहर कोई,
रक्तकमलों
से सुवासित
छू रहा है अधर कोई,

पंख
टूटेंगे न छूना
यार तितली बावरी है।

देह भींगी
भागती हैं
लाज से बोझिल दिशाएं,
खिड़कियों
के पार कोई
लिख रहा अपनी कथाएं,

छेड़ता है
रोज लेकिन
ज़ुर्म से मौसम बरी है ।

चाँदनी सी
रातरानी
रंग बेला के सुहाने,
अर्थ देने
लगे बिलकुल नए
सब गाने पुराने,

टांक लो
ये फूल जूड़े में
निवेदन आखिरी है ।


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

Monday, 29 June 2020

एक गीत -मौसम में खुशबू है इतर और पान की



चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -मौसम में खुशबू है इतर और पान की 

हाथों में 
मेहँदी है 
साड़ी शिफ़ान की |
मौसम में 
खुशबू है 
इतर और पान की |

रस्ते में
फिसलन है 
दिन है आषाढ़ का ,
नदियों का 
मंसूबा है 
शायद बाढ़ का ,
खेत में 
कछारों में 
हरियाली धान की |

घोंसले
बया के हैं
पेड़ हैं बबूलों के,
तन-मन
सब भींग रहे
वन,उपवन,फूलों के,
नाचते 
मयूरों से 
शोभा सिवान की |

हरे पेड़ 
उलझे हैं 
बिजली के तारों से ,
खिड़की के 
पाट खुले 
पुरवा बौछारों से ,

सोने की 
बाली फिर 
गुम दायें कान की |

गुड़हल के 
लाल ,पीत- 
फूल हैं कनेरों के ,
मेघों के 
घेरे में 
सूर्य हैं सवेरों के ,
रह -रह के 
बजती है 
पायल सीवान की |
कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल 



Saturday, 27 June 2020

एक गीत -हिन्दुस्तानी एकेडमी के लिए

हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रयागराज के अध्यक्ष
डॉ ० उदय प्रताप सिंह  बालकृष्ण भट्ट की मूर्ति का अनावरण करते हुए 
परिचय -हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रयागराज की स्थापना आज़ादी के पूर्व १९२७ में हुई थी |तत्कालीन मंत्री राय राजेश्वर बली के समय में | इसके पूर्व अध्यक्षों में बली साहब सप्रू जैसे विद्वान थे |इस संस्था में हिंदी उर्दू दोनों भाषाओँ को बढ़ावा मिला और अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुए |वर्तमान अध्यक्ष डॉ ० उदय प्रताप सिंह [आज़मगढ़ ] जी ने साहित्य के लिए कई पुरष्कार माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश से सृजित कराये जिसमें सबसे बड़ा पुरष्कार गुरु गोरखनाथ नामित पुरष्कार ५ लाख राशि का है |तुलसी ,फ़िराक ,दिवेदी ,बनादास ,भारतेंदु आदि अन्य पुरष्कारों के साथ २५ हजार का नवलेखन पुरष्कार भी है |हिन्दुस्तानी एकेडमी की त्रैमासिक पत्रिका भी है जो अनगिनत महत्वपूर्ण साहित्य पर विशेषांक निकाल चुकी है | वर्तमान अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह स्वयं एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेखक हैं उनकी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं | डॉ उदय प्रताप जी के सद्प्रयास से एकेडमी कई महत्वपूर्ण कार्य करने में सफल हुई |बालकृष्ण भट्ट जी की मूर्ति का अनावरण भी उन कार्यों में से एक है |मैं वर्तमान अध्यक्ष के उत्तम स्वास्थ्य और शतायु होने की मंगल कामना करता हूँ |
एक गीत -
हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रयागराज को समर्पित 


हिंदी, उर्दू ,लोकरंग यह 
सबकी बोली बानी है |
गंगा, जमुना, सरस्वती का
संगम हिन्दुस्तानी है |

गुरु गोरख के नाम यहाँ पर 
पुरस्कार अभिनन्दन है ,
शोध प्रकाशन ,मौलिक लेखन 
विद्वानों का वन्दन है ,
सन सत्ताइस में जन्मी 
यह भाषाओँ की रानी है |

आज़ादी को देखा इसने 
देखा पन्त ,निराला को ,
बालकृष्ण ,अकबर ,फ़िराक 
औ बच्चन की मधुशाला को ,
बली ,महादेवी ,सप्रू यह
परिमल की अगवानी है |

उदय प्रताप सिंह  के प्रयास से 
 तेवर इसका बदला है ,
उदयाचल से नया सूर्य फिर 
नये रंग में निकला है 
ज्ञान दीप यह जले हमेशा
यह मिट्टी बलिदानी है ।

तुलसी और कबीर हमारी 
संस्कृतियों के नायक हैं ,
निर्गुण ,सगुण रूप में दोनों 
रामकथा के गायक हैं ,
भोजपुरी ,अवधी ,बुन्देली 
ब्रज की यह दीवानी है 

भरद्वाज ऋषि  ,योगी जी
का इससे पावन नाता है ,
राम वनगमन मार्ग यही जो 
चित्रकूट को जाता है ,
श्रृंगवेरपुर ,कुम्भ कथाएँ 
यहाँ हर्ष सा दानी है |

विविध विधाएं परिचर्चाएं 
ग्रन्थों का उपहार यहाँ ,
ज्ञानी ,गुरुजन ,शोध सहायक 
सबको मिलता प्यार यहाँ 
विद्वानों की पुण्य भूमि यह 
गीतों भरी कहानी है |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

माननीय मुख्यमंत्री जी के साथ उदय प्रताप जी और प्रोफ़ेसर सदानन्द प्रसाद गुप्त 

Saturday, 20 June 2020

एक देशगान -राणा के संग भारत होगा अबकी हल्दीघाटी में



जयहिंद ! जय भारत ! जय जवान !



एक देशगान -
राणा के संग भारत होगा अबकी हल्दीघाटी में 

आँखों में 
हो स्वप्न स्वदेशी 
हाथों में हथियार रहे |
जितना 
अपनी माँ से उतना 
मातृभूमि से प्यार रहे |

सबसे ऊँची 
मूर्ति उसी की 
जो सैनिक ,बलिदानी हो ,
उसके खातिर 
प्रथम पुष्प हो 
सब नदियों का पानी हो ,

कविता 
उसके लिए हमारी 
वैदिक मंत्रोच्चार रहे |

गजनी ,गोरी ,
और सिकन्दर  
भारत माँ से हारे हैं ,,
सवा अरब 
बलवान हमारे 
ड्रैगन को ललकारे हैं ,

बाएं हाथ 
शीश दुश्मन का 
दायें में तलवार रहे |

गीता ,ग्रन्थ 
कुरान ,बाइबिल 
पूजनीय इस माटी में ,
राणा के संग 
भारत होगा 
अबकी हल्दीघाटी में ,

शांति विश्व को 
भारत देगा 
सुखमय यह संसार रहे |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
शौर्य और बलिदान की गाथा जिनके रक्त में है भारत के वीर सपूत 

Wednesday, 17 June 2020

एक गीत -काँटों का मौसम फूलों का खिलना मुश्किल है



चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -
काँटों का मौसम फूलों का खिलना मुश्किल है 


रिश्तों में 
दो गज की दूरी
मिलना मुश्किल है |
काँटों का 
मौसम फूलों
का खिलना मुश्किल है |

खत्म हुए 
सम्वाद शहर के 
रिश्ते गाँवों के ,
क़िस्से 
सुनते रहे 
राजपथ दुखते पाँवों के ,
इतना 
सूरज थका 
शाम को ढलना मुश्किल है |

कभी हाथ 
में हाथ तुम्हारा 
लेकर चलते थे ,
कुछ होंठों 
कुछ आँखों से 
सम्वाद निकलते थे ,
भूल गये 
चाँदनी 
रात को मिलना मुश्किल है |

रोशनियों 
की करो प्रतीक्षा 
हार नहीं अच्छी ,
जीवन के 
संघर्षों से 
तकरार नहीं अच्छी ,
बिना आँच 
के हिम रिश्तों 
का गलना मुश्किल है |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल 


एक देशगान -अब पार्थ जयद्रथ को रण में छलना होगा



एक देशगान -
अब पार्थ जयद्रथ को रण में छलना होगा 


अब समय 
पूर्व इस 
सूरज को ढलना होगा |
हे पार्थ 
जयद्रथ को 
रण में छलना होगा |

कब थकी 
युद्ध की नीति 
हिमालय बदलेगा ,
अब हिन्द 
महासागर 
का पानी उबलेगा ,
दुश्मन के 
सीने पर 
चढ़कर चलना होगा |

उठ काली 
बन विकराल 
उठो ब्रह्मोस ,सुदर्शन ,
फिर प्रलय 
करो हे महाकाल 
कर तांडव नर्तन ,
अब एक एक 
हिमखंड 
तुम्हें गलना होगा |

अब वीर
जवानों
रणभेरी तैयार करो ,
बन शुंग 
शिवाजी ,राणा 
अरि पर वार करो 
दुनिया को 
भारत के 
पीछे चलना होगा |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

Friday, 29 May 2020

एक गीत -मेहँदी रचे गुलाबी हाथों ने फिर किया प्रणाम

चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -
मेहँदी रचे गुलाबी हाथों ने फिर किया प्रणाम 


पीले कंगन 
नीलम पहने 
सोने जैसी शाम |
मेहँदी रचे 
गुलाबी हाथों 
ने फिर किया प्रणाम |

डोल रहे 
पीपल के पत्ते 
बिना हवाओं के ,
संकोचों में 
चाँद मेघ 
के घेरे बाहों के ,
निर्गुण राही
भटक गया है 
करके चारो धाम |

ब्रह्मकमल 
सी खुशबू 
फैली हुई ओसारे में ,
जाने क्या 
सन्देश 
छिपा है टूटे तारे में ,
स्मृतियाँ  
सिरहाने बैठी 
लगा रहीं हैं बाम |

पंचामृत से 
मन की मूरत 
कौन धो रहा है ,
अपनी ही 
छाया में कोई 
पेड़ सो रहा है |
एक निमन्त्रण 
घर आया है 
जाने किसके नाम |

नींद नहीं 
आँखों में रह -
रह बादल घेर रहे ,
हरे बाँस 
सीटियाँ बजाते 
वंशी  टेर  रहे ,
बौछारों 
की जद में जंगल ,
गाँव, शहर के पाम |


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल 

Tuesday, 26 May 2020

एक देशगान -सन बासठ की नहीं रही अब माटी हिन्दुस्तान की

भारत माता 

[यह गीत भारत के समस्त सैन्यबल को समर्पित है ]
एक देशगान -
सन बासठ की नहीं रही यह माटी हिन्दुस्तान की
 


छेड़ो मत लद्दाख ,हिमालय 
घाटी हिन्दुस्तान की |
सन बासठ की नहीं रही 
अब माटी हिन्दुस्तान की |

हिन्द महासागर उबलेगा 
धरती थर -थर कॉपेगी ,
बीजिंग अबकी बार 
तुम्हारा कद भी दिल्ली नापेगी ,

टूटेगी दीवार चीन की 
अब तेरे अभिमान की |


अनगिन रेजीमेंट डोगरा ,
सिक्ख ,नगा ,गढ़वाली हैं ,
मद्रासी ,पंजाब ,मराठा 
राजपूत बलशाली हैं ,

बलिदानों की स्वर्णिम 
गाथा यहाँ जाट बलवान की |


पंचशील के शांति 
कपोतों को हम नहीं उड़ाते हैं ,
अब आँखों में आँख 
डालकर दुश्मन से बतियाते हैं ,

अब हो वही तुम्हारी हालत 
जैसी पाकिस्तान की |

ड्रैगन हो तुम इंसानों पर 
विष के झाग उगलते हो ,
सबकी सरहद में घुसकर के 
विश्व शांति को छलते हो ,

फिर तुमने अपवित्र कर 
दिया है घाटी गलवान की |


अहंकार में तानाशाहों के 
सिंहासन जलते हैं ,
रावण को श्रीराम ,कंस को 
 कृष्ण ,सुदर्शन मिलते हैं ,

शांतिकाल में बुद्ध ,युद्ध में 
यहाँ गदा हनुमान की |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
[सभी चित्र -साभार गूगल ]




हमारी सीमाओं के प्रहरी | जय जवान जय हिन्द
विश्व के सर्वश्रेष्ठ सैनिक 

Sunday, 24 May 2020

एक गीत -मेरी सेवा मेरा तीरथ


भगवान धन्वन्तरी 

चिकित्सकों ,नर्सों और चिकित्सा से जुड़े कोरोना योद्धाओं को समर्पित गीत 
एक गीत -मेरी सेवा मेरा तीरथ 

धन्वतरि के अनुयायी 
हम करते हैं उपचार ।
जीवन की जब नैया डूबे 
करते उसको पार ।

जीवन रक्षक औषधियों से 
सबका ताप मिटाते ,
शल्य क्रिया से नेत्रहीन भी 
ज्योति नयन की पाते ,

भेदभाव के बिना सभी का 
करते हम उद्धार |

कुछ ने पत्थर हाथ उठाये 
कुछ ने नभ से फूल गिराये ,
संकट में हम नर्स ,चिकित्सक 
कोरोना योद्धा कहलाये ,

कुछ ने छीना पर्स दवाएं 
कहीं मिले उपहार |

हम तो सबको जीवन देकर 
हर दिन अपना फर्ज़ निभाते, 
हँस हँस कर सबका दुःख हरते 
कैसा भी हो मर्ज़ भगाते ,

मेरी सेवा मेरा तीरथ 
काशी या हरिद्वार |

अपनी आँख ,नींद 
सब कुछ है बीमारों के नाम ,
कोशिश हर क्षण अपना जीवन 
आये सबके काम ,

हम क्या जाने मौसम का रंग 
रिश्ते क्या त्यौहार |

युद्ध रहे या शांतिकाल 
हम मन से सेवा करते ,
तन का हो या मन का 
सबका जख्म हमीं तो भरते ,

काँटा चुनते और सजाते 
फूलों से संसार |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -सरहद पर बंकर में बैठा आँख दिखाता चीन

भारत माता के वीर सपूत 
एक गीत -सरहद पर बंकर में बैठा आँख दिखाता चीन 

सरहद पर 
बंकर में बैठा 
आँख दिखाता चीन |
अपनी -अपनी 
नौटंकी में 
राजनीति तल्लीन |

संसद में 
जब वेतन बढ़ता 
सभी एक हो जाते ,
आम आदमी 
के खातिर सब 
नकली अश्रु बहाते ,
मजदूरों को 
साँप समझकर 
बजा रहे सब बीन |

दिल्ली में 
दंगों की साजिश 
रचे 'आप 'के प्यारे ,
और मुम्बई 
में प्रमुदित हैं 
संतों के हत्यारे ,
पंचवटी में 
असुर राज है 
खतरे में कौपीन |

मजदूरों के 
बने वीडियो 
दिए न दाना -पानी ,
सेनाओं से 
साक्ष्य माँगते 
दिल से पाकिस्तानी ,
वोट बैंक के 
लिए दिखाई 
देते सब ग़मगीन |

राजभोग 
शहरों के खातिर 
पाते गाँव बताशा ,
खबर देखना 
मत टी ० वी ० पर 
है रंगीन तमाशा ,
राजगद्दियाँ 
कैसे इतनी 
हुई आचरणहीन |

छोड़ो यार 
सियासत पहले 
सरहद ,देश बचाओ ,
कोरोना को 
मात मिले फिर 
रघुपति राघव गाओ ,
हम तुम 
मिलकर फिर खायेंगे 
रसगुल्ला -नमकीन |

भारत चीन आमने -सामने 


Thursday, 21 May 2020

एक गीत -राम ! तुम्ही थे राम ! अवध की माटी बोल रही

प्रभु श्री राम 


एक गीत --आस्था का 
राम ! तुम्ही थे राम ! अवध की माटी बोल रही 
साक्ष्य सब निकल
निकल प्रणाम बोलने लगे ।
जो प्रमाण माँगते थे
राम बोलने लगे ।

राम ! तुम्ही थे राम ! अवध की माटी बोल रही 

सूर्यवंश के
रघुकुल की 
परिपाटी बोल रही |

राम ! तुम्ही 
थे राम ! अवध 
की माटी बोल रही |

षडयंत्रों ने 
इतिहासों में 
झूठी लिखी कहानी ,
जलसमाधि 
का अब भी 
साक्षी है सरयू का पानी ,

एक एक 
प्रतिमा रहस्य 
का पर्दा खोल रही |


चित्रकूट
से श्रीलंका तक 
वल्कल में वनवास रहा ,
बाल्मीकि 
तुलसी को तेरे 
होने पर विश्वास रहा ,

अश्वमेध के 
घोड़े का सच 
काठी बोल रही |


तुम हो अपराजेय 
अजन्मा 
कौन प्रमाणित करता ,
तेरे सम्मुख 
शीश झुकाता 
महाकाल भी डरता ,

यह नश्वर 
दुनिया सोने 
से माटी तोल रही |

भक्ति- भाव से 
विह्वल होकर 
सबरी के जूठे फल खाए,
जामवंत,सुग्रीव
पवनसुत को
भी हँसकर गले लगाए,

आँखों
देखी किष्किन्धा
की घाटी बोल रही ।


युग युग से 
इस रामकथा को 
भक्ति भाव से कहते ,
पवनपुत्र 
हनुमान यहाँ पर 
योगी बनकर रहते ,

कनक भवन के 
कण कण में 
माँ सीता डोल रही |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
रामजन्मभूमि समतलीकरण में प्राप्त मन्दिर के अवशेष
चित्र -साभार गूगल 


Tuesday, 19 May 2020

एक गीत -यादों में अब भी है मेहँदी जो छूट गई


चित्र -साभार गूगल -पेंटिंग्स राजा रवि वर्मा 


एक गीत -
यादों में अब भी है मेहँदी जो छूट गई 

सधे हुए 
होंठ मगर 
हाथों से छूट  गई |

कल मुझको 
सुनना 
ये वंशी तो टूट गई |

कल शायद 
झीलों में 
नीलकमल खिल जाये ,
पत्तों में 
छिपी हुई 
मैना भी मिल जाये ,

दिल से जो 
गाती थी 
बुलबुल वो रूठ गई |

डायरी 
तुम्हारी थी 
शब्द चित्र मेरे हैं ,
धरती पर 
अनगिन 
रंग बाँटते सवेरे हैं ,

यादों में 
अब भी है 
मेहँदी जो  छूट गई |

जीवन भर 
भटके हम 
फूलों के गन्ध द्वार ,
आँगन की 
तुलसी से 
कितनों ने किया प्यार ,

अपने मन 
की सुगंध 
दिनचर्या लूट गई |

आना कल 
चंदन वन 
मन का ये ताप हरे ,
कितने दिन 
बीत गये 
फूलों पर पाँव धरे ,

दोपहरी 
ओखल में 
धान हरे कूट गई |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

सभी चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, 17 May 2020

एक गीत -हम आये थे राजव्यवस्था को सोने में मढ़ने बाबू



एक गीत -श्रमिकों के लिए
हम आये थे राजव्यवस्था को सोने में मढ़ने बाबू 

अभी शहर से गाँव जा रहे 
हर मुश्किल से लड़ने बाबू !

ख़त लिखना फिर आ जाएंगे 
देश की मूरत गढ़ने बाबू !

पुल ,चौराहे ,सड़क बनाये 
हीरा काटे और तराशे ,
ईंटा ,गारा ,मिट्टी ढोए 
खाकर लाई ,चना  ,बताशे ,

भूखे -नंगे  धूप में निकले 
मानवता को पढ़ने बाबू !

बीवी ,बच्चे ,बाप ,मतारी 
सुख- दुःख सारी घटना भूले ,
दो रोटी सुख की तलाश में 
बलिया ,बक्सर ,पटना भूले ,

छोड़ जुहू -चौपाटी ,दिल्ली 
चले ताड़ पर चढ़ने बाबू !

बिना काम के कब तक देते 
रोटी साहब सेल्फी लेकर ,
हम टीवी पर बने तमाशा 
लगी चोट में फिर फिर ठोकर ,

कोई आया नहीं राह में 
दर्द हमारा पढ़ने बाबू !

मतलब की साथी है दुनिया 
कई कोस पर अपना घर है ,
घोड़ा -गाड़ी ,दाना -पानी 
नहीं साथ में ,कठिन डगर है ,

भटकाते ये मील के पत्थर 
नहीं दे रहे बढ़ने बाबू !

हर मौसम से आँख मिलाकर 
आसमान के नीचे सोये ,
रिक्शा ,ठेला ,गाड़ी खींचे 
किससे अपना दुखड़ा रोये ,

हम आये थे राजव्यस्था को 
सोने में मढ़ने बाबू !

सोंधी मिटटी हमें बुलाती 
बासमती की खुशबू वाली ,
लाल हरे तोते ,चिड़ियों से 
बतियाती आमों की डाली ,

रुमालों पर फूलों जैसा 
गाँव जा रहे कढ़ने बाबू !

देश रहेगा तब हम होंगे 
मानवता पर संकट भारी ,
सबको मिलकर लड़ना होगा 
लाइलाज है यह बीमारी ,

घर में रहना अब मत देना 
कोरोना को बढ़ने बाबू !

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

सभी चित्र साभार गूगल 


Thursday, 14 May 2020

एक गीत -कहीं तो होगा हरापन


गुलमोहर [चित्र -साभार गूगल ]

एक गीत -कहीं तो होगा हरापन 

छटपटाते 
प्यास से 
व्याकुल हिरन के प्रान |

और नदियों 
के किनारे 
शब्द भेदी बान |


जल रहे हैं 
वन ,नशीली 
आँधियों के दिन ,
हवा जूड़े
खोलकर के
ढूँढती है पिन ,


झील की 
लहरें अचंचल 
डूबता दिनमान |


निर्वसन 
हैं खेत ,
धानी दूब वाली मेड़ ,
चटख फूलों 
से भरे 
गुलमोहरों के पेड़ ,

बन्द आँखे 
मगर आहट 
सुन रहे हैं कान |


हँस रहीं हैं
मारिचिकाएँ
कर रहीं उपहास,
हर कदम
विभ्रम नहीं
बुझती पथिक की प्यास,

कहीं तो
होगा हरापन
और नखलिस्तान ।



धूल उड़ती 
देखती 
गोधूलि बेला ,शाम ,
माँ अकेले 
जप रही है 
कहीं सीताराम !

स्वप्न फिर 
आषाढ़ 
बनकर रोपते हैं धान |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 

Thursday, 7 May 2020

एक गीत -किसी गीत के सुन्दर मुखड़े जैसी मेरी माँ थी

श्री कृष्ण और माँ यशोदा 


एक गीत -माँ 
किसी गीत के सुन्दर मुखड़े जैसी  मेरी माँ थी 

गंगा ,जमुना ,
पोथी,पत्रा 
और न जाने क्या थी   ?
किसी गीत के 
सुन्दर मुखड़े 
जैसी मेरी  माँ थी   |

रामचरित 
मानस .गीता सी
तुलसी आँगन की ,
एक जादुई 
परीकथा है 
मेरे बचपन की ,
अश्रु बहे 
या दर्द सभी का 
मेरी वही दवा थी ।|

मन्दिर की 
घंटी ,कपूर सी 
दिया ओसारे का ,
मौसम 
पढ़ती रही 
उम्र भर गिरते पारे का  ,
सूखे में 
बारिश ,गर्मी में 
शीतल मंद हवा थी    |

पुरखों का 
तर्पण ,पोतों का 
व्याह रचाती थी   ,
उत्सव ,कथा 
व्याह में मंगल 
गीत सुनाती थी ,
बेटी ,बहू 
पराये  ,अपने  
सबके लिए दुआ थी    |

वंशी ,घूँघरू 
पायल बनकर 
दिनभर बजती थी   ,
घर का थी 
श्रृंगार मगर 
माँ कभी न सजती थी    ,
ओरहन सुनती 
निर्णय देती 
माँ इक राजसभा थी  |

नंगे पाँव 
पहुँचती थी   
माँ खेत -कियारी में ,
पान दान में 
पान फेरती 
धान बखारी में ,
चूल्हा -चक्की  
सानी -पानी 
जाने कहाँ -कहाँ थी  |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

सभी चित्र -साभार गूगल 

सती अनुसूया त्रिदेवों की माँ के रूप में 

Wednesday, 6 May 2020

एक देशगान =उसे क्षमा क्यों जो मानवता का दुश्मन हत्यारा है


भारत माँ के वीर बलिदानी सपूत [शहीद ]


एक देशगान -
उसे क्षमा क्यों जो मानवता का दुश्मन ,हत्यारा है 

सत्य अहिंसा 
दया ,धर्म 
सब कापुरुषों का नारा है |
उसे क्षमा क्यों 
जो मानवता 
का दुश्मन ,हत्यारा है |

कब तक 
मौन तिरंगा 
ढोयेगा वीरों की लाशों को ,
खत्म करो 
लाहौर ,कराची 
दोष न दो इतिहासों को ,
गरुडों से 
जब कोई विषधर 
लड़ा हमेशा हारा है |

घर में भूंजी
भाँग नहीं 
पर हथियारों की मंडी है ,
हर दिन 
राक्षस पैदा 
करनेवाली रावलपिंडी है ,
ज्वालामुखियाँ 
बुझा दिये हम 
तू तो इक अंगारा है |

अग्नि और 
ब्रह्मोस उड़े तो 
टुकड़ों में बँट जायेगा ,
भारत माँ 
के नेत्र खुले तो 
नक्शे से मिट जायेगा ,
गिलगित 
बाल्टिस्तान 
भी लेंगे हमें जान से प्यारा है |


कैसा यह 
रमजान बहाता 
खून पड़ोसी घाटी में ,
याद नहीं अब 
कितने हैं 
बलिदान हमारी माटी में ,
फिर गीदड़ 
वाली फ़ौजों ने 
सिंहों को ललकारा है |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

भारत माता के सजग प्रहरी 

Saturday, 2 May 2020

एक देशगान -चिड़िया आँधी के आमंत्रण का कब गीत सुनाती

भारत का गौरव भारतीय वायुसेना 



एक देशगान -
चिड़िया आँधी के आमंत्रण का कब गीत सुनाती है 

मजहब नहीं 
राष्ट्र से ऊपर  
प्यारे हिन्दुस्तान है |

यह सोने की
मिट्टी इसमें
वीरों का बलिदान है ।

अपनी कला -
संस्कृति ,कुछ को 
गाथा नहीं लुभाती है ,
चिड़िया 
आँधी के आमंत्रण 
का कब गीत सुनाती है ,
हमें नर्मदा 
सरयू ,गंगा 
यमुना पर अभिमान है |

मातृभूमि की 
निंदा करते 
वस्त्र पहनते खादी का,
सोते -जगते 
स्वप्न देखते
भारत की बर्बादी का,
जिसे तिरंगे 
से नफ़रत हो 
समझो वह शैतान है |

राष्ट्र विरोधी 
खुले आम 
दुश्मन से हाथ मिलाते हैं,
भारत में 
रहकर भी 
भारत माता को धमकाते हैं
टूट गयी है 
नींद देश की 
मत समझो अनजान है |

षड्यंत्रों से 
महायुद्ध से 
कभी नहीं हम डरते हैं ,
अतिशय हो 
तो महाकाल बन 
केवल तांडव करते हैं,
अब ब्रह्मोस
हमारी ताकत
हर सैनिक भगवान है।

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 



माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी
प्रधानमन्त्री भारत सरकार 

विश्व राजनेता मोदी जी

माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार  श्री नरेंद्र मोदी जी  मोदी जी अब विश्व नेता बन चुके हैं-भारत की अलग पहचान बनाने वाले प्रधानमंत्री फिर विकास ...