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Friday, 13 August 2021

एक गीत-बाढ़ की विभीषिका पर /पानी में डूब गए पेड़ हरसिंगार के

 


एक गीत -बाढ़ की विभीषिका पर 


डूब गए

पानी में

पेड़ हरसिंगार के।

स्वप्न गिरे

औंधे मुँह

पूजा और प्यार के ।


द्वार-द्वार

गंगा और

जमुना की लहरें हैं,

बस्ती में

नावें हैं

मदद और पहरे हैं,

कजली चुप

फीके रंग

सावनी फुहार के ।


नदियों के

पेटे में

एक नया प्रयाग है,

चूल्हों में

पानी है

बुझी हुई आग है,

मछली सा

तैर रहे

आदमी कछार के ।


जिनके 

घर-बार

हुए वो भी बंजारों से,

खतरा है

नदियों के

टूटते किनारों से,

चाँदनियों 

के चेहरे

हैं बिना सिंगार के ।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार


चित्र साभार गूगल


एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

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