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एक गीत -बाढ़ की विभीषिका पर
डूब गए
पानी में
पेड़ हरसिंगार के।
स्वप्न गिरे
औंधे मुँह
पूजा और प्यार के ।
द्वार-द्वार
गंगा और
जमुना की लहरें हैं,
बस्ती में
नावें हैं
मदद और पहरे हैं,
कजली चुप
फीके रंग
सावनी फुहार के ।
नदियों के
पेटे में
एक नया प्रयाग है,
चूल्हों में
पानी है
बुझी हुई आग है,
मछली सा
तैर रहे
आदमी कछार के ।
जिनके
घर-बार
हुए वो भी बंजारों से,
खतरा है
नदियों के
टूटते किनारों से,
चाँदनियों
के चेहरे
हैं बिना सिंगार के ।
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


