Sunday, 27 November 2011

एक गीत -खुली किताबों में

चित्र -गूगल से साभार 
 चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में 
बीत रहे हैं 
दिन सतरंगी 
केवल  ख़्वाबों में |
चलो मुश्किलों 
का हल ढूँढें 
खुली  किताबों में |

इन्हीं किताबों में 
जन- गण -मन 
तुलसी की चौपाई ,
इनमें ग़ालिब -
मीर ,निराला 
रहते हैं परसाई ,
इनके भीतर 
जो खुशबू वो 
नहीं  गुलाबों में |

इसमें कई 
विधा के गेंदें  -
गुड़हल खिलते हैं ,
बंजर  मन  
को इच्छाओं  के  
मौसम मिलते हैं |
लैम्पपोस्ट में 
पढ़िए या फिर 
दफ़्तर, ढाबों में |

तनहाई से 
हमें किताबें 
दूर भगाती हैं ,
ज्ञान अगर 
खुद सो जाए 
तो उसे जगाती हैं ,
इनमें  जो 
परवाज़ ,कहाँ 
होती सुर्खाबों में ?

इनको पढ़कर 
कई घराने 
गीत सुनाते हैं ,
इनकी  जिल्दों में 
जीवन के रंग 
समाते हैं ,
ये न्याय सदन ,
संसद के सारे 
प्रश्न -जबाबों में |


चित्र -गूगल से साभार 
[इलाहाबाद में विगत दिनों पुस्तक मेले में भ्रमण के दौरान मन में यह विचार आया कि क्यों न पुस्तकों के संदर्भ में कोई कविता /गीत लिखा जाए |यह गीत इसी विचार की देन है |पुस्तकें वास्तव में हमें रास्ता दिखाती हैं ,ये अन्धेरे में जलती हुई मशाल होती हैं |हमारी सही मायने में दोस्त होती हैं |पुस्तकें वक्त का आईना होती हैं |हम कवि /लेखक इनके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं |]

Thursday, 24 November 2011

एक गीत -प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है

चित्र -गूगल से साभार 
प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है 
शीत का मौसम 
ठिठुरती काँपती है |
बड़े होने तक -
हमें माँ ढांपती  है |

हरा है स्वेटर मगर 
मैरून  बुनती है ,
नज़र धुँधली है मगर 
माँ  कहाँ सुनती है ,
कभी कंधे तो  -
कभी कद नापती है |

रात -दिन बिखरा हुआ 
माँ घर सजाती है ,
बाद्य यंत्रों के बिना 
निर्गुण सुनाती है ,
पढ़ नहीं सकती 
कथाएं बाँचती है |

जानती रस्में -
प्रथाएं जानती है ,
प्रकृति का हर रंग 
माँ पहचानती है ,
सीढियाँ चढ़ते -
उतरते हाँफती है |


पिता कम्बल और 
हम हैं शाल ओढ़े ,
भाग्य में उसके 
अँगीठी और मोढ़े ,
माँ हमारा मन 
परखती -जाँचती है |

एक चिड़िया की तरह 
माँ घोंसला बुनती ,
वह हमारा सुर सुगम -
संगीत सा सुनती ,
उत्सवों में संग 
बहू के नाचती है |
चित्र -गूगल से साभार 

Tuesday, 22 November 2011

उत्तर प्रदेश के हिन्दी साहित्यकार -पुस्तक समीक्षा

सम्पादकीय सम्पर्क -डॉ० महेश दिवाकर 
09927383777
उत्तर प्रदेश के हिन्दी साहित्यकार -सन्दर्भ कोश 
पुस्तक समीक्षा 
हिन्दी के कवियों /लेखकों का परिचय ,उनके लेखन की विधा उनकी पुस्तकें और उनका संपर्क न० यदि एक पुस्तक में उपलब्ध हो जाये तो कितना सुखद लगेगा ,कितना आसान हो जाएंगी तमाम मुश्किलें |दोस्तों यह मुश्किल आसान हो गयी है और इस दिशा में एक महत्वपूर्ण किताब का प्रकाशन कर दिखाया है -अखिल भारतीय साहित्य कला मंच मुरादाबाद के डॉ० महेश दिवाकर ,डॉ० राम गोपाल भारतीय और डॉ० मीना कौल जी के सम्मिलित प्रयास ने |इस पुस्तक में उत्तर प्रदेश के लगभग सवा पांच सौ कवियों लेखकों का परिचय ,लेखन की विधा और संपर्क का पता दिया गया है |इस तरह का प्रयास अन्य स्थानों पर तो हुआ था जैसे भोपाल में राजुरकर राज ने शब्द शिल्पी नाम से देश स्तर के साहित्यकारों को जोड़ने का प्रयास किया था |यह प्रयास सराहनीय कहा जायेगा लेकिन कुछ ज़माने के हिसाब से खामियां भी हैं जैसे आधुनिक संचार साधनों जैसे ई मेल और मोबाईल न० का न होना |लेकिन इतने बड़े प्रयास में बहुत दिक्कतें भी आती हैं इसमें जन सहयोग भी अपेक्षित है |संपादक मंडल ने पुस्तक का नाम -उत्तर प्रदेश के हिन्दी साहित्यकार -संदर्भ कोश  नाम दिया है |अब इस पुस्तक का दूसरा भाग प्रकाशित होना है |इसमें वही कवि या लेखक शामिल किये जायेंगे जिनकी कम से कम एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हो |जो भी कवि या लेखक इस शर्त को पूरी करते हों निम्लिखित पते पर अपना विवरण संपादक मण्डल को प्रेषित कर दें |लेखक या कवि उत्तर प्रदेश में निवास भी करता हो |यदि वह उत्तर प्रदेश में जन्म लिया हो लेकिन कही और रहता हो उसे सम्मिलित नहीं किया जायेगा |यह पुस्तक सरस्वती प्रकाशन मुरादाबाद से प्रकाशित है |इस पुस्तक का मूल्य दो सौ रूपये है |भाई डॉ० महेश दिवाकर जी भाई डॉ० राम गोपाल भारतीय जी और डॉ० मीना कौल जी आप सभी को इस सराहनीय कार्य के लिए बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं | सम्पादकीय पता -डॉ० महेश दिवाकर -संस्थापक अध्यक्ष अ० भा० साहित्य कला मंच पता -सरस्वती भवन ,मिलन विहार -दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग ,मुरादाबाद -244001[उ० प्र० ]

सम्पादक मण्डल 
उत्तर प्रदेश के हिन्दी साहित्यकार -सन्दर्भ कोष 

Sunday, 20 November 2011

एक गीत -राजा को टकसाल चाहिए

चित्र -गूगल से साभार 
हमें चाँदनी -
चौक ,मुम्बई और 
नहीं भोपाल चाहिए |
हम किसान 
बुनकर के वंशज  
हमको रोटी -दाल चाहिए |

हथकरघों से 
सपने बुनकर 
हम कबीर के पद गाएंगे ,
युगों -युगों की 
भ्रान्ति तोड़ने 
काशी से मगहर जाएंगे ,
हमें एक 
सारंगी साधो 
झाँझ और करताल चाहिए |

हम किसान हैं 
कठिन जिन्दगी 
फिर भी हर मौसम में गाते ,
धूप -छाँह से ,
नदी -पहाड़ों से 
हैं अपने रिश्ते -नाते ,
सूखे खेत 
बरसना मेघों 
हमको नहीं अकाल चाहिए |

आप धन्य !
जनता के सेवक 
रोज बनाते महल -अटारी .
भेष बदलकर 
भाव बदलकर 
हमको छलते बारी -बारी ,
परजा के 
हिस्से महंगाई 
राजा को टकसाल चाहिए |
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, 2 November 2011

एक ताजा गीत -भरे कमण्डल में मंहगाई

चित्र -गूगल से साभार 
भरे कमण्डल में महंगाई
क्या सीखा  
रैदास से भाई ?
भरे कमण्डल में 
महंगाई |

तुम कबीर का 
हाल न पूछे ,
भूत -प्रेत 
बेताल न पूछे ,

भूले तुलसी 
की चौपाई |

जाति -धरम की 
किए  सियासत ,
फिर चुनाव में 
अपनी सांसत ,

हम बकरे 
तुम हुए कसाई |

घर में उड़ती 
धूल न देखा ,
पढ़े न घोटालों 
का लेखा ,

तुलसी चौरे 
पर मुरझाई |

वही पुरानी 
ढपली गाना ,
कैसे भी हो 
सत्ता पाना ,

सोने का मृग 
सीता माई |

धूनी जैसे 
होते चूल्हे ,
हाथ बंधे हैं 
टूटे कूल्हे ,

और पाँव में 
फटी बिवाई |

बहरे कान 
ढकी हैं ऑंखें ,
जिन्दा चिड़िया 
टूटी पाँखें ,

उड़े घोंसले 
आंधी आई |

राजनीति अब 
खेल तमाशा ,
शकुनि और 
शतरंजी पासा ,

धर्मराज सब 
गूंगे भाई |
[एक बड़ी पार्टी के युवराज कल बनारस में संत रविदास जी के मन्दिर में गए थे |देश की बड़ी -बड़ी समस्याओं पर युवराज मौन हैं |काश मूल समस्याओं पर अपना ध्यान खींचते |भाई अब जनता बहुत जागरूक है ]

Monday, 31 October 2011

एक गज़ल -इन नन्हें परिन्दों को

चित्र -गूगल से साभार 
इन नन्हें परिन्दों को अगर पर नहीं लगता 
उड़ते हुए बाजों से कभी डर नहीं लगता 

मुद्दत से दीवारों ने जहाँ ख्वाब न देखा 
वो ताजमहल होगा मगर घर नहीं लगता 

पौधे न सही फूल के ,कांटे तो उगे हैं 
साबित तो हुआ बाग ये बंजर नहीं लगता 

नदियों के अगर बांध ये टूटे नहीं होते 
ये गांव था यारों ये समन्दर नहीं लगता 

हर हर्फ़ यहाँ लिक्खा है रिश्वत की कलम से 
इन्साफ करे करे ऐसा ये दफ़्तर नहीं लगता 

ये शोर पटाखों के हैं कुछ चीखें दबाये 
ऐ दोस्त दीवाली का ये मंजर नहीं लगता 

इस पेड़ की शाखों पे अगर फल नहीं होते 
इन गाते परिन्दों को ये पत्थर नहीं लगता 

[मेरी यह गज़ल दैनिक जागरण के साहित्यिक परिशिष्ट पुनर्नवा में प्रकाशित हो चुकी है ]

Monday, 24 October 2011

एक गीत -महक रहा खुशबू सा मन

चित्र -गूगल से साभार 
मित्रों आप सभी को दीपावली की सपरिवार शुभकामनाएं |एक ताज़ा गीत आज सुबह लिखकर आपके लिए पोस्ट कर रहा हूँ |आज गांव जाना है तीस अक्टूबर तक अंतर्जाल से दूर रहूँगा तब तक के लिए विदा ले रहा हूँ |आज एक आश्चर्य हुआ मेरे ब्लॉग सुनहरी कलम पर किसी ने टिप्पड़ी किया मेरे ही ईमेल जैसा नाम बस एक अक्षर नहीं था |मैंने कमेंट्स डिलीट कर दिया |लेकिन यदि किसी ब्लॉग पर मेरे नाम से कोई भद्दा कमेंट्स हो तो मुझे क्षमा करेंगे |मैं लौटकर निगरानी करूँगा |मेरा कम्प्यूटर का ज्ञान  बस ब्लोगिंग तक सीमित है |लेकिन किसी ने दुबारा गलत हरकत किया तो साईबर क्राईम के अंतर्गत मुकदमा करने में भी नहीं हिचकूंगा |आप सभी का स्नेहाकांक्षी -जयकृष्ण राय तुषार 
आँगन में चंद्रमा उगा 
गेंदा के 
फूलों सी देह 
महक रहा खुशबू सा मन |
आंगन में 
चन्द्रमा उगा 
भर गया प्रकाश से गगन |

घी डूबी 
मोम सी उँगलियाँ 
रह -रह के बाती को छेड़तीं ,
लौ को जब 
छेड़ती हवाएँ 
दरवाजा हौले से भेड़तीं ,
टहनी में 
उलझा है आंचल 
पुरवाई तोड़ती बदन |

भाभी सी 
सजी हुई किरनें 
इधर उधर  चूड़ियाँ बजातीं ,
चौके से 
पूजाघर तक 
उत्सव के गीत गुनगुनातीं ,
लौटे कजरौटों 
के दिन 
काजल का आँख से मिलन |

मौन पिता 
बैठे दालान में 
आज हुए किस तरह मुखर ,
गंगासागर 
जैसी माँ 
गोमुख सी लग रही सुघर |
खिला -खिला 
गुड़हल सा मन 
संध्या के माथे चन्दन |
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 21 October 2011

एक गीत -सन्दर्भ -घर से दूर खड़ी दीवाली

चित्र -गूगल से साभार 
घर से दूर खड़ी दीवाली
घर से दूर 
खड़ी दीवाली 
सारी रात अमावस काली |

महालक्ष्मी 
गणपति बाबा 
धनकुबेर हो गए प्रवासी ,
फिर भी 
ले पूजा की थाली 
बाट जोहती पूरनमासी ,
संवरी बहू 
न बिंदिया चमकी 
फीकी है होठों की लाली |

मन में बस 
फुलझड़ियां छूटीं 
महंगाई के डर के मारे ,
घर -आंगन 
खपरैल -खेत में 
अंधकार ने पांव पसारे ,
घर की मलकिन 
उलटे -पलटे 
खाली जेबें बटुआ खाली |

हुई पीलिया ग्रस्त 
रोशनी 
सिकुड़ गयी दीये की बाती ,
उतर न पाया 
भूत कर्ज का 
उतर न पाई साढ़ेसाती ,
जितने भी 
सपने देखे थे 
सबके सब हो गए मवाली |
चित्र -गूगल से साभार 
[मेरा यह गीत जनसत्ता वार्षिकांक 2010[ कोलकाता से ]में प्रकाशित है ]

Sunday, 16 October 2011

महाप्राण निराला की पचासवीं पुण्य तिथि-एक यादगार आयोजन

हिन्दी के महान कवि पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला 
निराला जी की पचासवीं पुण्य तिथि पर निराला जी की कलम, पत्र ,टोपी, कुर्ता और डाक टिकट इलाहबाद संग्रहालय को सुपुर्द करते महाप्राण निराला के पौत्र  डॉ० अमरेश त्रिपाठी -सबसे बाएं कथाकार प्रो० दूधनाथ सिंह उनके पीछे कवयित्री अनामिका सिंह ,मध्य में संग्रहालय के निदेशक डॉ० राजेश पुरोहित उनके दायें डॉ० अमरेश त्रिपाठी उनके दायें मंगलेश डबराल एकदम दायें निराला संस्थान के अध्यक्ष चन्द्र विजय चतुर्वेदी 
महाप्राण  निराला की पचासवीं पुण्य तिथि-एक यादगार आयोजन
विगत शनिवार 15-10-2011 हिन्दी के महान कालजयी कवि महाप्राण निराला की पुण्यतिथि गरिमापूर्ण ढंग से इलाहाबाद संग्रहालय में  मनायी गयी | इस अवसर पर निराला जी की कलम ,उनका कुर्ता ,टोपी ,कुछ पत्र और महादेवी द्वारा हस्ताक्षरित भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट महाप्राण निराला  के पौत्र  डॉ० अमरेश त्रिपाठी द्वारा संग्रहालय के निदेशक डॉ० राजेश पुरोहित को भेंट किया गया | इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार प्रोफेसर दूधनाथ सिंह ने किया | कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जाने -माने कवि मंगलेश डबराल थे |कार्यक्रम में भोपाल से आये चर्चित कथाकार हरि भटनागर का कहानी पाठ ,मंगलेश डबराल और दिल्ली से आयी चर्चित कवयित्री अनामिका सिंह का काव्य पाठ भी हुआ |इस कार्यक्रम का संचालन इलाहाबाद विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग के रीडर  सूर्यनारायण ने किया |अतिथियों का स्वागत संग्रहालय के निदेशक डॉ० राजेश पुरोहित ने किया तत्पश्चात कार्यक्रम का शुभारम्भ महाप्राण निराला जी द्वारा लिखित सरस्वती वन्दना 'वर दे ----के सस्वर पाठ से हुआ ,जिसे निराला जी के ही पौत्र डॉ० अमरेश त्रिपाठी ने किया |मंच पर निराला साहित्य संसथान के अध्यक्ष श्री चन्द्र विजय चतुर्वेदी जी भी उपस्थित थे |कार्यक्रम में निराला जी के प्रपौत्र युवा कवि विवेक निराला महाप्राण निराला की पौत्र वधू और अमरेश त्रिपाठी जी की धर्मपत्नी एवं असोसिएट प्रोफेसर  डॉ० अर्चना त्रिपाठी [एस० एस० खन्ना डिग्री कालेज ,इलाहाबाद ]एवं निराला जी के ही एक अन्य पौत्र डॉ० अखिलेश त्रिपाठी जी मौजूद थे |प्रमुख श्रोताओं में डॉ० एस० के० शर्मा ,श्री राजेश मिश्र ,श्री रंजन शुक्ल ,डॉ० प्रभाकर पाण्डेय [संग्रहालय से ]उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो० अली अहमद फातमी [इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ]प्रोफेसर अनीता गोपेश ,अनिल सिद्धार्थ ,कमल किशोर यश मालवीय ,हरीश चन्द्र पांडे अजित पुष्कल आदि मौजूद थे |
महाप्राण निराला की पचासवीं पुण्य तिथि पर इलाहाबाद संग्रहालय में आयोजित कार्यक्रम  में कहानी पाठ करते कथाकार हरि भटनागर एकदम बाएं कवयित्री अनामिका सिंह उनके दायें क्रमश वरिष्ठ कथाकार और कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर दूधनाथ सिंह ,मंगलेश डबराल और चन्द्र विजय चतुर्वेदी अध्यक्ष निराला साहित्य संस्थान इलाहाबाद 

Wednesday, 12 October 2011

एक गीत -चुप्पी ओढ़ परिन्दे सोये सारा जंगल राख हुआ

चित्र -गूगल से साभार 
चुप्पी ओढ़ परिंदे सोये सारा जंगल राख हुआ 
राजनीति के 
नियम न जानें 
फिर भी राजदुलारे हैं |
राजमहल की 
बुनियादों पर 
गिरती ये दीवारें हैं |

सबकी प्यास 
बुझाने वाले 
मीठे झरने सूखे हैं ,
गोदामों में 
सड़ते गेहूँ 
और प्रजाजन भूखे हैं ,
अब तो 
केवल अपनी प्यास 
बुझाते ये फव्वारे हैं |

चुप्पी ओढ़ 
परिन्दे सोये 
सारा जंगल राख हुआ ,
वनराजों का 
जुर्म हमेशा ही 
जंगल में माफ़ हुआ ,
कैसे -कैसे 
राजा ,मंत्री 
कैसे अब हरकारे हैं |

क्रान्ति 
सिताब -दियारा से हो 
या दांडी के रस्ते हो ,
संसद में 
जाकर के प्यारे 
बस जनता पर हँसते हो ,
रथयात्राएं 
कितनी भी हों 
हम हारे के हारे हैं |

राजघाट भी 
जाना हो तो चलें 
लिमोजिन कारों से ,
अब  समाजवादी, 
जननायक ,
आते  पांच सितारों से ,
हम शीशे की 
बन्द दीवारों में 
धुंधलाए पारे हैं |

जब भी हम 
चेहरे को देखें 
धुँधले दरपन आते हैं ,
सिर्फ़ 
रागदरबारी 
सत्ता के खय्याम सुनाते हैं ,
परिवर्तन 
विकास की बातें 
महज किताबी नारे हैं |

Monday, 10 October 2011

एक गीत -कालिख पुते हुए हाथों में

चित्र -गूगल से साभार 
कालिख पुते 
हुए हाथों में 
दिये दीवाली के |
कापालिक की 
कैद सभी
मंतर खुशहाली के |

हल टूटे हैं 
खेत रेहन में 
भरते मालगुजारी ,
सूदखोर 
के हाथ सरौते 
हम सब पान -सुपारी ,
पत्तल भी 
अदृश्य क्या देखें 
सपने थाली के ?

जादू -टोने 
तन्त्र -मंत्र सब 
करके हार गये ,
और अधिक 
पीड़ादायक 
निकले बेताल नये ,
इन्द्रप्रस्थ के 
रहें प्रजाजन 
या वैशाली के |

सरपंचों के 
घर -आंगन 
रोशनी नियानों की ,
हम 
बस्ती में रहते 
खस्ताहाल मकानों की ,
सोने में 
उछाल कान 
सूने घरवाली के |

सब नकली 
घी ,हव्य -
आचमन हवनकुंड में ,
बसे पुरोहित 
गांव छोड़ 
दादर ,मुलुण्ड में ,
ढूँढे से भी 
फूल नहीं 
मिलते शेफाली के |

Monday, 3 October 2011

एक प्रेम गीत -बीत गया दिन मौसम को पढ़ते

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
बीत गया दिन मौसम को पढ़ते -एक गीत 
खुली किताबें 
बीत गया दिन 
मौसम को पढ़ते |
अनगढ़ 
चट्टानों में बैठे 
तुमको हम गढ़ते |

कभी अजंता 
कभी एलोरा 
खजुराहो आये ,
लेकिन तेरा 
रम्य रूप हम 
कहीं नहीं पाये ,

शीशे मिले 
खरोचों वाले 
कहाँ तुम्हें मढ़ते |

कहीं महकते 
फूल कहीं पर 
उगे कास ,बढ़नी ,
हिरन न भटके 
पीछे मुड़कर 
देख रही हिरनी ,

प्यास देखती 
रही झील को 
पर्वत पर चढ़ते |

हरी घास पर 
बैठी चिड़िया 
खुजलाती पाँखें ,
सतरंगी 
सपनों में उलझी 
दो  जोड़ी ऑंखें ,

इच्छाओं के 
रूमालों पर 
फूलों सा कढ़ते |

बंजारन का 
बोझ न उतरे 
सपने अभी कुंवारे ,
मन के जंगल 
हमीं अकेले 
किसको करे इशारे ,

हाथ थामकर 
संग -संग उसके 
हम आगे बढ़ते |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Sunday, 2 October 2011

लोकभाषा में कविता -गान्ही जी- कवि कैलाश गौतम

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी 
यह गाँधी जी को संबोधित लोकभाषा [भोजपुरी ]में लोकप्रिय कवि कैलाश गौतम की पुरानी कविता है इसका पाठ वह कवि सम्मेलनों में भी किया करते थे |आज भी यह कविता उतनी ही प्रासंगिक है |
तोहरे घर के रामै मालिक सबै कहत हौ गान्ही जी 
सिर फूटत हो गला कटत हौ लहू बहत हौ गान्ही जी 
देश बटत हौ जैसे हरदी धान बटत हौ गान्ही जी 
वेर विसवतै ररुवा चिरई रोज ररत हौ गान्ही जी 
तोहरे घर के रामै मालिक सबै कहत हौ गान्ही जी


हिंसा राहजनी हौ बापू हौ गुंडई डकैती हउवै 
देसी खाली बम बनूक हौ कपड़ा ,घडी बिलैती हउवै 
छुआछूत हौ ऊँच -नीच हौ जात -पांत पंचइती हउवै
का बतलाई कहै सुनै में सरम लगत हौ गान्ही जी 
केहू क नाहीं चित्त ठेकाने बरम लगत हौ गान्ही जी 
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ गान्ही जी 
गाभिन हौ कि ठाँठ मरकही भरम लगत हौ गान्ही जी 

जे अलले बेईमान इहाँ ऊ डकरै किरिया खाला 
लम्बा टीका मधुरी बानी पंच बनावल जाला 
चाम ,सोहारी काम सरौता पेटै -पेट घोटाला 
एक्को करम न छूटल लेकिन चौचक कंठी -माला 
नोना लगल भीत हौ सगरौ गिरत -परत हौ गान्ही जी 
हाड़ परल हौ अंगनै -अंगना मार टरत हौ गान्ही जी 
झगरा कई जर अनखुन खोजै जहाँ लहत हौ गान्ही जी 
खसम मार के धूम -धाम से गया करत हौ गान्ही जी 

उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ  हौ 
कब्बो गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ 
दुसरे के कब्जा में आपन दाना -पानी अब्बौ हौ 
जहाँ खजाना रहल हमेशा उहैं खजाना अब्बौ हौ 
कथा -कीर्तन बाहर ,भीतर जुआ चलत हौ गान्ही जी 
माल गलत हौ दुई नंबर क दाल गलत हौ गान्ही जी 
चाल गलत -चउपाल गलत हर फाल गलत हौ गान्ही जी 
ताल गलत ,हड़ताल गलत पड़ताल गलत हौ गान्ही जी 

घूस पैरवी जोर सिफ़ारिस झूठ नकल मक्कारी वाले 
देखतै -देखत चार दिना में भइलै महल अटारी वाले 
इनके आगे भकुआ जैसे फरसा अउर कुदारी वाले 
देहलै खून पसीना देहलै तब्बौ बहिन -मतारी वाले 
तोहरै नाम बिकत हौ सगरौ मांस बिकत हौ गान्ही जी 
ताली पीट रहल हौ दुनियां खूब हँसत हौ गान्ही जी 
केहू कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्ही जी 
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी 

जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निशाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आज़ादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै 
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी 
आग लगल हौ धुवां उठत हौ नाक बजत हौ गान्ही जी 
करिया अच्छर भइंस बरोब्बर वेद लिखत हौ गान्ही जी 
एक समय क बागड़बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी 
कवि -कैलाश गौतम 
समय [08-01-1944से 09-12-2006]
[कवि -कैलाश गौतम का परिचय हमारे दोनों ही ब्लाग में दिया गया है -]

Saturday, 1 October 2011

गंगा हमको छोड़ कभी मत इस धरती से जाना


यह गीत मेरी बिलकुल प्रारम्भिक पोस्ट में था उस समय ब्लॉगर मित्रों /पाठकों  का ध्यान शायद इस पर नहीं जा सका था ,इसलिए पुन: इसे पोस्ट कर रहा हूँ -
गंगा हमको छोड़ कभी मत इस धरती से जाना 
गंगा हमको छोड़ कभी मत
इस धरती से जाना।
तू जैसे कल तक बहती थी
वैसे बहती जाना।

तू है तो ये पर्व अनोखे
ये साधू , सन्यासी,
तुझसे कनखल हरिद्वार है
तुझसे पटना, काशी,
जहॉं कहीं हर हर गंगे हो
पल भर तू रुक जाना |

भक्तों के उपर जब भी
संकट गहराता है ,
सिर पर तेरा हाथ
और आंचल लहराता है,
तेरी लहरों पर है मॉं
हमको भी दीप जलाना |

तू मॉं नदी सदानीरा हो
कभी न सोती हो,
गोमुख से गंगासागर तक
सपने बोती हो,
जहॉं कहीं बंजर धरती हो
मॉं तुम फूल खिलाना।

राजा रंक सभी की नैया
मॉं तू पार लगाती
कंकड़- पत्थर, शंख -सीपियॉं
सबको गले लगाती
तेरे तट पर बैठ अघोरी
सीखे मंत्र जगाना    |

छठे छमासे मॉं हम
तेरे तट पर आयेंगे
पान -फूल ,सिन्दूर-
चढ़ाकर दीप जलायेंगे 
मझधारों में ना हम डूबें
मॉं तू पार लगाना।
दोनों ही चित्र गूगल से साभार 

Sunday, 25 September 2011

मेरा एक गीत -सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के लिए

सुर साम्राज्ञी भारत रत्न -लता मंगेशकर 
कल फेसबुक पर ब्लॉगर  अंजू शर्मा ने लता जी का कोई गाना टैग किया था |कमेंट्स में मैंने लिखा कि  लता को सुनना एक सदी को सुनना है |बस यहीं से मेरे जेहन में एक विचार आया की क्यों न इस महान गायिका के जन्म दि  पर एक  गीत लिखने की कोशिश की जाये |मित्रों लता जी का जन्म 28 सितम्बर 1929 को ब्रिटिश इंडिया में इंदौर में हुआ था |इनके पिता का नाम दीनानाथ मंगेशकर था जो कि गोमांतक मराठा समाज से थे |जब लता जी मात्र तेरह वर्ष की थीं तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया |लता जी के पिता के दोस्त थे नवयुग चित्र पट मूवी के मालिक विनायक दामोदर कर्नाटकी ,इन्होनें ही लता जी की देखभाल किया |सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोसले ,हृदय नाथ मंगेशकर ,उषा मंगेशकर और मीना मंगेशकर, इन सब भाई बहनों में लता जी सबसे बड़ी हैं |लता जी के  प्रथम संगीत गुरू स्वयं इनके पिता थे |लता जी ने पांच वर्ष की उम्र से ही संगीत सीखना प्रारम्भ कर दिया |प्रारम्भ में फ़िल्मी दुनिया में लता जी की आवाज़ को पतली या [thin]कहा गया |लता जी के गायन का विधिवत सफ़र 1940-1942]से शुरू होता है |भारत की प्रादेशिक और विदेशी लगभग 36भाषाओँ में लता जी ने गाया |सन 1974-1991में गिनीज बुक में भी इनका नाम दर्ज़ हुआ |भारत के  सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से इनको सम्मानित किया गया |हम सदी की इस महान गायिका को अपना यह गीत समर्पित कर रहे हैं -
सदी की महान गायिका लता मंगेशकर जी को समर्पित
मेरा एक गीत [लता जी के जन्म दिन  28 सितम्बर पर विशेष  भेंट ]
सदी को सुन रहा हूँ मैं 
लता के 
गीत के कुछ फूल 
केवल चुन रहा हूँ मैं |
उन्हें सुनकर के 
लगता है 
सदी को सुन रहा हूँ मैं |

सुहागन 
चूड़ियों में भी 
उसी की धुन खनकती है ,
भरे फूलों से 
जंगल में कोई 
चिड़िया चहकती है ,

प्रशंसा में 
लिखूं तो क्या लिखूं  
सिर धुन रहा हूँ मैं |

उसी की धुन में 
मंदिर के पुजारी 
मन्त्र पढ़ते हैं ,
हम उसकी 
प्यास की खातिर 
सुनहरे शब्द गढ़ते हैं ,

सुरों के 
रेशमी धागों से 
खुद को  बुन रहा हूँ मैं |

सभी संगीत के 
सुर मिल के 
उसका सुर बनाते हैं ,
वतन के 
नाम पर भी हम 
उसी को गुनगुनाते हैं ,

वो सातो 
आसमानों में 
उसी को सुन रहा हूँ मैं |


तुम्हीं से 
जागतीं सुबहें ,
सुहानी शाम होती हैं ,
सुरों की 
हर कोई महफ़िल 
तुम्हारे नाम होती है ,


तुम्हें 
बचपन से सुनता हूँ 
मगर बे -धुन रहा हूँ मैं |

समन्दर 
भावनाओं का 
लता के दिल में बहता है ,
कि जैसे 
झील में कोई 
कमल का फूल रहता है ,

वो परियों 
की कहानी है 
उसी को गुन रहा हूँ मैं |
चित्र -गूगल से साभार 

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