एक गीत-रख गया मौसम सुबह अंगार फूलों पर
रख गया
मौसम
सुबह अंगार फूलों पर ।
वक्त पर
लम्बे-घने
तरु भी हुए बौने,
रेत
नदियों में
पियासे खड़े मृगछौने,
ताक में
अजगर
शिकारी नदी कूलों पर ।
सूर्य भी
छिपने लगा
है बादलों के घर,
हो गए हैं
सभ्यता के
आज कातर स्वर,
घोसलों पर,
चील के
कब्जे बबूलों पर ।
हो गयी
दुनिया तमाशा
वक्त भी बुज़दिल,
अब अहिंसा से
विजय का
पथ हुआ मुश्किल,
इस सदी में
कौन कायम
है उसूलों पर ।
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |

