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| चित्र -साभार गूगल |
एक प्रेमगीत -हरी घास मेड़ों की
जूड़े में
बेला फिर
गूँथ रही शाम |
मौसम
ने आज लिखा
चिट्ठियाँ अनाम |
टहनी की
कलियों ने
पाँव छुए फूल के ,
हँसकर के
गोड़ रंगे
नाउन फिर धूल के ,
पिंजरे में
एक सुआ
कहे राम -राम |
महुआ के
फूल चुए
बीन रहा कोई ,
चुपके से
अलबम को
छीन रहा कोई ,
खिड़की से
झाँक कोई
कर गया प्रणाम |
आम के
टिकोरे हैं
कहीं छाँह पेड़ों की ,
पायल से
बात करे
हरी घास मेड़ों की ,
सोया है
चाँद कोई
लगा रहा बाम |
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| चित्र -साभार गूगल |

