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| चित्र -साभार -गूगल |
एक गीत - कैक्टस का युग
कैक्टस का
युग कहाँ
अब बात शतदल की ?
हो गयी
कैसे विषैली
हवा जंगल की |
फेफड़ों में
दर्द भरकर
डूबता सूरज ,
हो गया
वातावरण का
रंग कुछ असहज ,
अब नहीं
लगती सुरीली
थाप मादल की |
भैंस के
आगे बजाते
सभी अपनी बीन ,
आज के
चाणक्य ,न्यूटन
और आइन्स्टीन ,
कोयले की
साख बढ़ती
घटी काजल की |
रुग्ण सारी
टहनियों के
पात मुरझाये ,
इस तुषारापात में
चिड़िया
कहाँ गाये ,
मत बनो
चातक बुझाओ
प्यास बादल की |
भोर का
कलरव
लपेटे धुन्ध सोता है ,
एक लोकल
ट्रेन जैसा
दिवस होता है ,
किसे
चिन्ता है
हमारे कुशल -मंगल की |
सभी चित्र साभार गूगल

