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Friday, 6 December 2019

एक गीत -कैक्टस का युग



चित्र -साभार -गूगल 

एक गीत - कैक्टस का युग 

कैक्टस का
युग कहाँ 
अब बात शतदल की ?
हो गयी 
कैसे विषैली 
हवा जंगल की |

फेफड़ों में
दर्द भरकर 
डूबता सूरज ,
हो गया 
वातावरण का 
रंग कुछ असहज ,
अब नहीं 
लगती सुरीली 
थाप मादल की |

भैंस के 
आगे बजाते 
सभी अपनी बीन ,
आज के 
चाणक्य ,न्यूटन 
और आइन्स्टीन ,
कोयले की 
साख बढ़ती 
घटी काजल की |

रुग्ण सारी 
टहनियों के 
पात मुरझाये ,
इस तुषारापात में
चिड़िया 
कहाँ गाये ,
मत बनो 
चातक बुझाओ 
प्यास बादल की |

भोर का 
कलरव 
लपेटे धुन्ध सोता है ,
एक लोकल 
ट्रेन जैसा 
दिवस होता है ,
किसे 
चिन्ता है 
हमारे कुशल -मंगल की |

सभी चित्र साभार गूगल 

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