![]() |
| चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
छत बचा लेता है मेरी ,वही पाया बनकर
मुझको हर मोड़ पे मिलता है फरिश्ता बनकर
तेरी यादें कभी तनहा नहीं होने देतीं
साथ चलती हैं मेरे ,धूप में साया बनकर
तंगहाली में रही जब भी व्यवस्था घर की
मेरी माँ उसको छिपा लेती है परदा बनकर
आज के दौर के बच्चे भी कन्हैया होंगे
आप पालें तो उन्हें नंद यशोदा बनकर
घर के बच्चों से नहीं मिलिये किताबों की तरह
उनके जज्बात को पढ़िये तो खिलौना बनकर
दो
घर के बच्चों से नहीं मिलिये किताबों की तरह
उनके जज्बात को पढ़िये तो खिलौना बनकर
दो
वही उड़ान का का असली हुनर दिखाते हैं
तिलस्म तोड़ के आंधी का, घर जो आते हैं
तिलस्म तोड़ के आंधी का, घर जो आते हैं
कभी प्रयाग के संगम को देखिये आकर
यहाँ परिंदे भी डुबकी लगाने आते हैं
ये बात सच है कि दरिया से दोस्ती है मगर
मल्लाह डूबने वालों को ही बचाते हैं
लिबास देखके मत ढूंढिए फकीरों को
कुछ जालसाज भी चन्दन तिलक लगाते हैं
कब इनको खौफ़ रहा जाल और बहेलियों का
परिंदे बैठ के पेड़ों पे चहचहाते हैं
हम अपने घर को भी दफ़्तर बनाये बैठे हैं
परीकथाओं को बच्चों को कब सुनाते हैं
किसी गरीब के घर को मचान मत कहना
कबीले पेड़ की शाखों पे घर बनाते हैं
परीकथाओं को बच्चों को कब सुनाते हैं
किसी गरीब के घर को मचान मत कहना
कबीले पेड़ की शाखों पे घर बनाते हैं

