Friday, 31 July 2026

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

 

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में 


मोगरे का फूल 

जूड़े में 

सजाती है. 

नदी हँसकर 

ज़िन्दगी का 

 गीत गाती  है.


धूप -छाँही 

सफऱ में 

यह हाँफती भी है,

सर्द मौसम 

निर्वसन 

यह काँपती भी है.

घन तिमिर है 

घाट पर 

बस दीप बाती है.


कुछ महावर 

कुछ हलद से 

पाँव लहरों में,

झील में 

दिखता कहाँ 

दिनमान शहरों में,

भोर में 

चिड़िया सुनहरी 

कहाँ आती है.


थकी हिरनी 

हुआ मद्धम 

बांस वन का स्वर,

बर्फ़बारी में 

पहाड़ी गीत 

गाता घर,

अब कोई 

ढ़िबरी कहाँ 

रस्ता बताती है.


चित्र साभार गूगल 


कवि /गीतकार 

जयकृष्ण राय तुषार 

Sunday, 26 July 2026

एक गीत -नदी के इस पार मैं हूँ

 

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -नदी के इस पार मैं हूँ 


नदी के इस पार 

मैं हूँ 

उस तरफ सब फूल हैं.

घना कोहरा 

नाव माझी 

बात में मशगूल हैं.


गन्ध पुष्पों के 

बिना अब 

देवता पर क्या चढ़े?

शोक में 

डूबा हुआ मन 

मंत्र वैदिक क्या पढ़े?

तैर भी 

सकता नहीं 

गहरे भंवर के कूल हैं.



रेत के टीले 

इधर हैं 

उधर चंदन वन घना है,

आरती के 

स्वर उधर हैं 

इधर मौसम अनमना है,

राम पथ में 

पाँव नंगे 

कांच बिखरे शूल हैं.

चित्र साभार गूगल श्रीराम जी 


एक गीत -कत्थक की शामें

 

चित्र साभार गूगल 

एक सामयिक गीत -कत्थक की शामें अब सुनती हैं बैले 


चन्दन वन 

माटी में 

काकरोच फैले.

आँखों में 

स्वप्न सभी 

हो गए विषैले.


विकसित है 

भारत पर 

संस्कार हीन हुआ,

मीठा जल 

झरनों का कैसे 

नमकीन हुआ,

गाँव से 

नगर आकर 

हो गए बनैले.


आगजनी,

हिंसा है 

पूनम की रातों में,

सम्मोहन 

लुप्त हुआ 

मौसम की बातों में,

मीठे 

झरबेरों के 

स्वाद हैं कसैले.


टूटते कुटुंबों 

के दरपन 

भी टूट गए,

संग शुष्क 

नदियों से 

हिरनों के छूट गए,

कत्थक की 

शामें अब 

देख रहीं बैले.

चित्र साभार गूगल 


एक पुराना लोकभाषा गीत -चुहुल ननद भौजाई कै

  चित्र साभार गूगल  एक पुराना लोकभाषा गीत  लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित...