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Monday, 4 April 2016

एक गीत -चांदनी थी तुम

चित्र -गूगल से साभार 



एक गीत -चांदनी थी तुम 
चांदनी थी 
तुम ! धुँआ सी 
हो गयी तस्वीर | |
मन तुम्हारा 
पढ़ न पाए 
असद ,ग़ालिब ,मीर |

घोंसला  तुमने 
बनाया 
मैं परिंदों सा उड़ा ,
वक्त की 
पगडंडियों पर 
जब जहाँ चाहा मुड़ा .
और तेरे 
पांव में 
हर पल रही जंजीर |

खनखनाते 
बर्तनों में 
लोरियों में गुम रही .
घन  अँधेरे में 
दिए की लौ 
सरीखी तुम रही ,
आंधियां 
जब भी चलीं 
तुम हो गयी प्राचीर |

पत्थरों में भी 
अनोखी 
मूर्तियाँ गढ़ती रही ,
एक दस्तावेज 
अलिखित 
रोज तुम पढ़ती रही ,
ताल के 
शैवाल में तुम 
खिली बन पुण्डीर |

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