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Sunday, 8 April 2012

एक गीत -बांध रहे नज़रों को फूल हरसिंगार के

चित्र -गूगल से साभार 
बांध रहे नज़रों को फूल हरसिंगार के
बाँध रहे 
नज़रों को 
फूल हरसिंगार के |
तुमने 
कुछ बोल दिया 
चर्चे हैं प्यार के |

मौसम का 
रंग -रूप 
और अधिक निखरा है ,
सैलानी 
मन मेरा 
आसपास बिखरा है ,
आज 
मिला कोई 
बिन चिट्ठी ,बिन तार के |

उतरे हैं 
पंछी ये 
झुकी हुई डाल से ,
रिझा गया 
कोई फिर 
नैन ,नक्श ,चाल से |
टीले 
मुस्तैद खड़े 
जुल्फ़ को संवार के |

बलखाती 
नदियों के संग 
आज बहना है ,
अनकहा 
रहा जो कुछ 
आज वही कहना है ,
अब तक 
हम दर्शक थे 
नदी के कगार के |
[मेरा यह गीत नवगीत की पाठशाला में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है -साभार ]

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