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| चित्र -गूगल से साभार |
बांध रहे नज़रों को फूल हरसिंगार के
बाँध रहे
बाँध रहे
नज़रों को
फूल हरसिंगार के |
तुमने
कुछ बोल दिया
चर्चे हैं प्यार के |
मौसम का
रंग -रूप
और अधिक निखरा है ,
सैलानी
मन मेरा
आसपास बिखरा है ,
आज
मिला कोई
बिन चिट्ठी ,बिन तार के |
उतरे हैं
पंछी ये
झुकी हुई डाल से ,
रिझा गया
कोई फिर
नैन ,नक्श ,चाल से |
टीले
मुस्तैद खड़े
जुल्फ़ को संवार के |
बलखाती
नदियों के संग
आज बहना है ,
अनकहा
रहा जो कुछ
आज वही कहना है ,
अब तक
हम दर्शक थे
नदी के कगार के |
[मेरा यह गीत नवगीत की पाठशाला में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है -साभार ]