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| चित्र -गूगल से साभार |
उम्र की इस ढलान पर |
कभी बहा करती थी
यह गंगा उफान पर |
वर्षों का इतिहास समेटे
कथा कह रही ,
आँसू पीते ,मलबा ढोते
मगर बह रही ,
टुकड़ों में बंट जाती है
यह हर कटान पर |
ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश
सगर भी भूल गये ,
कहाँ भागीरथ की
पूजा के फूल गये ,
गंगा को अब बेच रहे
पंडे दुकान पर |
इससे ही महिमा है
काशी औ प्रयाग की ,
घिरी आग की ,
इसका जल लहराता था
पूजा अजान पर |
यह गंगा कोई नदी नहीं
जग माता है ,
वेदों की साक्षी
उनकी उद्गाता है ,
यही मुक्ति देती हम -
सबको श्मशान पर |
वन में बहती गंगा
बहती चट्टानों में
देवों में भी पूजित -
पूजित इंसानों में ,
मगर आज संकट है
इसके आन -बान पर |

