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| चित्र -गूगल से साभार |
प्यार के हम गीत रचते हैं इन्हीं कठिनाइयों में
खिल रहा है
खिल रहा है
फूल कोई
धान की परछाइयों में |
सो रहे
खरगोश से दिन
पर्वतों की खाइयों में |
ज्वार पर
देखो समय के
गीत पंछी गा रहे हैं ,
बादलों के
नर्म फाहे
चाँद को सहला रहे है ,
देखकर
तुमको यहीं हम
खो गए पुरवाइयों में |
हलद
बांधे चल रहा
मौसम हरे रूमाल में ,
बांधे चल रहा
मौसम हरे रूमाल में ,
लगे हैं
खिलने गुलाबी-
कँवल मन के ताल में ,
साँझ ढलते
मन हमारा
खो गया शहनाइयों में |
कास -बढ़नी
को लगे फिर
चिठ्ठियाँ लिखने उजाले ,
आँख पर
सीवान के
चश्में चढ़े हैं धूप वाले ,
एक आंचल
इत्र भींगा
उड़ रहा अमराइयों में |
झील की
लहरें नहाकर
रेशमी लट खोलती हैं ,
चुप्पियों
के वक्त भी
ऑंखें बहुत कुछ बोलती हैं ,
प्यार के
हम गीत

