हँसी चुराता
हँसते धानों में |
तुम्हीं महकती हो
फूलों की इन
मुस्कानों में |
सूने घर की
पृष्ठभूमि में जाने
कितने रंग सजाती ,
उत्सव के दिन
घूँघट में तुम
सबसे पहले मंगल गाती |
खिल जाते हैं
रंग तुम्हीं से
माँ के पानों में |
हरियाली के
सपने लेकर
मेघ गगन में छाये होंगे ,
मेंहदी और
महावर वाले दिन
तुमसे ही आये होंगे |
तेरी लौ से
जल उठते हैं
दिये मकानों में |
भूखे -प्यासे
थके सफर से
हम जब घर आते ,
तेरे होंठों पर
खुशियों के
इन्द्रधनुष छाते ,
पंछी बनकर
उड़ती

