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| चित्र -गूगल से साभार |
पढ़ते -पढ़ते
आप, और हम
लिखते -लिखते बोर हो गए |
राजनीति के
इस अरण्य में
कितने आदमखोर हो गए |
पाँव तले
शीशों की किरचें
चेहरों पर नाख़ून दिख रहे ,
अदब घरों में
तने असलहे
फिर भी हम नवगीत लिख रहे ,
कटी पतंगें
कब गिर जाएँ
हम मांझे की डोर हो गए |
अख़बारों
के पहले पन्ने
उनके जो बदनाम हो गए ,
कालजयी
कृतियों के लेखक
कलाकार गुमनाम हो गए ,
काले कौवे
हंस बन गए
सेही वन के मोर हो गए |
गिरते पुल हैं
टूटी सड़कें
प्रजातंत्र लाचार हो गया ,
राजनीति
का मकसद सेवा नहीं
सिर्फ़ व्यापार हो गया ,
क्रांतिकारियों
के वंशज हम

