एक गीत -श्रमिकों के लिए
हम आये थे राजव्यवस्था को सोने में मढ़ने बाबू
अभी शहर से गाँव जा रहे
हर मुश्किल से लड़ने बाबू !
ख़त लिखना फिर आ जाएंगे
देश की मूरत गढ़ने बाबू !
पुल ,चौराहे ,सड़क बनाये
हीरा काटे और तराशे ,
ईंटा ,गारा ,मिट्टी ढोए
खाकर लाई ,चना ,बताशे ,
भूखे -नंगे धूप में निकले
मानवता को पढ़ने बाबू !
बीवी ,बच्चे ,बाप ,मतारी
सुख- दुःख सारी घटना भूले ,
दो रोटी सुख की तलाश में
बलिया ,बक्सर ,पटना भूले ,
छोड़ जुहू -चौपाटी ,दिल्ली
चले ताड़ पर चढ़ने बाबू !
बिना काम के कब तक देते
रोटी साहब सेल्फी लेकर ,
हम टीवी पर बने तमाशा
लगी चोट में फिर फिर ठोकर ,
कोई आया नहीं राह में
दर्द हमारा पढ़ने बाबू !
मतलब की साथी है दुनिया
कई कोस पर अपना घर है ,
घोड़ा -गाड़ी ,दाना -पानी
नहीं साथ में ,कठिन डगर है ,
भटकाते ये मील के पत्थर
नहीं दे रहे बढ़ने बाबू !
हर मौसम से आँख मिलाकर
आसमान के नीचे सोये ,
रिक्शा ,ठेला ,गाड़ी खींचे
किससे अपना दुखड़ा रोये ,
हम आये थे राजव्यस्था को
सोने में मढ़ने बाबू !
सोंधी मिटटी हमें बुलाती
बासमती की खुशबू वाली ,
लाल हरे तोते ,चिड़ियों से
बतियाती आमों की डाली ,
रुमालों पर फूलों जैसा
गाँव जा रहे कढ़ने बाबू !
देश रहेगा तब हम होंगे
मानवता पर संकट भारी ,
सबको मिलकर लड़ना होगा
लाइलाज है यह बीमारी ,
घर में रहना अब मत देना
कोरोना को बढ़ने बाबू !
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
सभी चित्र साभार गूगल

