![]() |
| बुरांस |
एक गीत-
नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ
नदियों में
कंचन मृग
सुबहें वो शाम कहाँ ?
धुन्ध की
किताबों में
सूरज का नाम कहाँ ?
दुःख की
छायाएं हैं
पेड़ों के आस-पास,
फूल,गंध
बासी है
शहरों का मन उदास,
सिर थामे
बैठा दिन
ढूंढेगा बाम कहाँ ?
अल्मोड़ा
कौसानी
हाँफती मसूरी है,
प्यार भरा
रिश्ता भी
प्रकृति से जरूरी है,
पंचवटी में
आये फिर
जटायु,राम कहाँ ?
![]() |
टूट रहे
अनगिन विस्फोटों से,
हिमगिरि
के मुखमण्डल
भरे हुए चोटों से,
इन बुरांस
फूलों का दर्द
पढ़े पाम कहाँ ?
कवि जयकृष्ण राय तुषार
![]() |
| सभी चित्र साभार गूगल |


