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Sunday, 7 February 2021

एक गीत-नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ

 

बुरांस

एक गीत-

नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ


नदियों में

कंचन मृग 

सुबहें वो शाम कहाँ ?

धुन्ध की

किताबों में

सूरज का नाम कहाँ ?


दुःख की

छायाएं हैं

पेड़ों के आस-पास,

फूल,गंध

बासी है

शहरों का मन उदास,

सिर थामे

बैठा दिन

ढूंढेगा बाम कहाँ ?


अल्मोड़ा

कौसानी

हाँफती मसूरी है,

प्यार भरा

रिश्ता भी

प्रकृति से जरूरी है,

पंचवटी में

आये फिर

जटायु,राम कहाँ ?


शिलाखण्ड

टूट रहे

अनगिन विस्फोटों से,

हिमगिरि

के मुखमण्डल

भरे हुए चोटों से,

इन बुरांस

फूलों  का दर्द 

पढ़े पाम कहाँ ? 


कवि जयकृष्ण राय तुषार

सभी चित्र साभार गूगल



एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ में ...