Thursday, 16 April 2026

एक देशगान -संत विवेकानंद बनो

 

संत विवेकानंद जी 

एक देशगान -भारत माँ के युवा सपूतों 


भारत माँ के 

युवा सपूतों 

फूलों का मकरन्द बनो.

आर्यभट्ट, 

अब्दुल कलाम 

या संत विवेकानंद बनो.


राष्ट्र गीत के 

साथ भोर हो 

हर घर लगा तिरंगा हो,

बेटे बनें 

भागीरथ जैसे 

बेटी सरयू-गंगा हो.

दिए जलाओ 

अंधियारे में 

हर पथ का आनंद बनो.


सबसे सुन्दर 

देश हमारा 

संविधान भी प्यारा है,

पर्वत घाटी 

सागर, नदियां 

हर मौसम ही न्यारा है,

देश प्रेम से 

बड़ा नहीं कुछ 

साथी मत जयचंद बनो.


भारत माँ 

देवों को प्यारी 

यह मिट्टी बलिदानी है,

चंदन की 

खुशबू समीर में 

अमृत जैसा पानी है,

अपने अंदर 

कंस न पालो 

वासुदेव या नन्द बनो.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

भारत माता 

Saturday, 11 April 2026

एक गीत -जिस पावन मिट्टी में खिलते

  

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -जिस पावन मिट्टी में खिलते 


जिस पावन मिट्टी में खिलते 
ये फूल उसे महकाते हैं.
हम भारत माँ के बच्चे हैं 
भारत के गीत सुनाते हैं.

ब्रह्म कमल की खुशबू इसमें 
गंगा निर्मल बहती है,
भक्ति भाव से सरयू माता 
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ 
निधि वन में रास रचाते हैं.

इस मिट्टी का रंग सलोना 
मौसम यहाँ बदलते हैं,
लोकरंग के साथ विविधता 
साथ लिए हम चलते हैं,
हम आज़ादी का महापर्व 
उत्सव की तरह मनाते हैं.

विंध्य, नीलगिरि और हिमांचल 
खुलकर इसमें हँसते हैं,
इस नंदन कानन में जाने 
कितने पंछी बसते हैं,
मोर नाचते, हिरन खेलते 
झरने गीत सुनाते हैं.

भारत माँ की पावन छवि को 
फिर  सोने में मढ़ते हैं,
जो भी अनगढ़ पत्थर हैं 
हम उनको फिर से गढ़ते हैं,
हम अहं तोड़ते असुरों का 
लंका भी हमीं जलाते हैं 


कवि /गीतकार 
जयकृष्ण राय तुषार 
भारत माता चित्र साभार गूगल 


एक गीत -मैं अपनी वंशी को टेरूंगा

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