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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल-
कितना अच्छा मौसम यार पुराना था
कितना अच्छा मौसम यार पुराना था
घर- घर में सिलोन रेडियो गाना था
खुशबू के ख़त होठों के हस्ताक्षर थे
प्रेम की आँखों में गोकुल,बरसाना था
कौन अकेला घर में बैठा रोता था
सुख-दुःख में हर घर में आना-जाना था
रिश्तों में खटपट थी तू-तू ,मैं मैं भी
फिर भी मरते दम तक साथ निभाना था
महबूबा की झलक भी उसने देखी कब
बस्ती की नज़रों में वह दीवाना था
कहाँ रेस्तरां होटल फिर भी मिलना था
गाँव के बाहर पीपल एक पुराना था
गाय, बैल,चिड़ियों से बातें होती थी
बेज़ुबान पशुओं से भी याराना था
घर भर उससे लिपट के कितना रोये थे
बेटे को परदेस कमाने जाना था
बरसों पहले गाँव का ऐसा मंज़र था
नदियाँ टीले जंगल ताल मखाना था
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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