![]() |
| चित्र साभार गूगल |
![]() |
| स्मृतिशेष कथा लेखिका उषाकिरण खां |
इस ग़ज़ल के मतले का शेर कथा लेखिका उषाकिरण खां को समर्पित है
एक ग़ज़ल -मैंने दिल से कुछ कहा
भाप में तब्दील इक दरिया का पानी हो गया
एक किस्सागो शहर का ख़ुद कहानी हो गया
खुशबुओं की शाल ओढ़े आ गया छत पर ये कौन
चाँद निकला और मौसम रातरानी हो गया
इक खड़ाऊं रखके भी सारी अयोध्या थी ग़रीब
राम जब लौटे नगर फिर राजधानी हो गया
राग, बंदिश, ताल, सुर, लय का पता कुछ भी न था
मिल गयी महफ़िल तो गायक खानदानी हो गया
मन के सारे रंग भी फूलों से फागुन में खिले
बाग का मंज़र गुलाबी, पीला, धानी हो गया
मांगकर छल से भिखारी देवता भी बन गए
देने वाला कर्ण जैसा वीर दानी हो गया
इस सियासत को समझने का सलीका और है
मैंने दिल से कुछ कहा कुछ और मानी हो गया
कवि /शायर
जयकृष्ण राय तुषार
![]() |
| चित्र साभार गूगल |
.jpeg)

