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| कृष्ण भक्त मीराबाई |
एक गीत-भारत की नारी
हर युग में
भारत की नारी
शिखरों को चूमा करती है।
वह दीप शिखा
बनकर जीवन पथ
का सारा तम हरती है ।
लिखती है
गीत 'सुभद्रा' बन
रण में झाँसी की रानी है,
'भारती'सरीखी
विदुषी वह
अनुसूया जैसी दानी है,
जब भक्ति
प्रेम का भाव उठे
मीरा कब विष से डरती है ।
सावित्री
सीता माता ने
सुंदर पति धर्म निभाया है,
यशगान
नारियों का अनुपम
वेदों,ग्रन्थों ने गाया है,
सब भार
उठाये जीवों का
स्त्री ही माता धरती है।
कल्पना चावला बन
तारों में पँख
लगाकर उड़ती है,
विजयी मुद्रा में
स्वर्ण पदक लेकर
ही पीछे मुड़ती है,
इसरो में बैठे
चन्द्रयान का
स्वप्न सजाया करती है ।
गंगा,यमुना
नर्मदा और
सरयू जीवन की रेखा है,
इस रम्य सृष्टि में
हम सबने
इनकी महिमा को देखा है,
हर नदी
हरापन लाती है
खाली सागर को भरती है ।
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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| महारानी लक्ष्मीबाई |

