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Saturday, 3 September 2011

मेरी एक गज़ल

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
समन्दर से उठे हैं या नहीं बादल ये रब जाने 
नजूमी  बाढ़ का मंजर लगे खेतों को दिखलाने 

नमक से अब भी सूखी  रोटियां मज़दूर खाते हैं 
भले ही कृश्न चंदर ने लिखे हों इनपे अफ़साने 

रईसी देखना है मुल्क की तो क्यों भटकते हो 
किसी रहबर का घर देखो या फिर मंदिर के तहखाने 

मुसाफ़िर छोड़ दो चलना ये रस्ते हैं तबाही के 
यहाँ हर मोड़ पे मिलते हैं साकी और मयखाने 

चलो जंगल से पूछें या पढ़ें मौसम की ख़ामोशी 
परिंदे उड़ तो सकते हैं मगर गाते नहीं गाने 

ये वो बस्ती है जिसमें सूर्य की किरणें नहीं पहुंचीं 
करेंगें जानकर भी क्या ये सूरज- चाँद के माने


खवातीनों के हिस्से कम नहीं दुश्वारियां अब भी 
पलंग पर बैठने का हक नहीं है इनको सिरहाने  

सफ़र में साथ चलकर हो गए हम और भी तन्हा 
न उनको हम कभी जाने न वो हमको ही पहचाने 
चित्र -गूगल से साभार 

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गीत गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ ...