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Monday, 11 July 2011

मेरी एक गज़ल

आँखों ने जो देखा वो अफ़साना भी नहीं है 
वो यारों मोहब्बत का दीवाना भी नहीं है 

अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे 
इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है 

इक दिन की मुलाकात से गफलत में शहर है 
सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है 

वो ढूढता फिरता है हरेक शै में गज़ल को 
अब मीर औ ग़ालिब का जमाना भी नहीं है 

फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत 
मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है 

हर मोड़ पे वो राह बदल लेता है अपनी 
गर दोस्त नहीं है तो बेगाना भी नहीं है 

इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी 
इस शहर में तो कोई मैखाना भी नहीं है 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ में ...