आँखों ने जो देखा वो अफ़साना भी नहीं है
वो यारों मोहब्बत का दीवाना भी नहीं है
अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है
इक दिन की मुलाकात से गफलत में शहर है
सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है
वो ढूढता फिरता है हरेक शै में गज़ल को
अब मीर औ ग़ालिब का जमाना भी नहीं है
फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत
मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है
हर मोड़ पे वो राह बदल लेता है अपनी
गर दोस्त नहीं है तो बेगाना भी नहीं है
इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी
