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Tuesday, 29 May 2018

एक गीत -कास -वन जलता रहा


चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -कास -वन जलता रहा 

भोर में 
उगता रहा और 
साँझ को ढ़लता रहा |
सूर्य का 
रथ देखने में 
कास -वन जलता रहा |

नदी विस्फारित 
नयन से 
हांफता सा जल निहारे ,
गोपियाँ 
पाषाणवत हैं  
अब किसे वंशी पुकारे ,
प्रेम से जादा 
विरह दे 
कृष्ण भी छलता रहा |

चांदनी के 
दौर में मैं 
धूप पर लिखता रहा ,
दरपनों  में 
एक पागल 
आदमी दिखता रहा ,
सारथी का 
रथ वही ,
पहिया वही, चलता रहा |
चित्र -गूगल से साभार 

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

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