मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ
हँसकर के सारे ग़म को भुलाती हैं लड़कियाँ
खतरा सभी को रहता है यूँ अपने आस-पास
जब भी कटी उँगलियाँ, तो थीं अपनी खुरपियाँ
मिलती है गालियाँ उन्हें ईनाम कम मिले
सीने में ग़म छिपाये निकलती हैं वर्दियाँ
जो बुझ गए चराग़ उन्हें पूछता है कौन
जलते हुए दियों को बुझाती हैं आँधियाँ
मुश्किल बहुत है सच में पहाड़ों की जिन्दगी
फिर भी सभी के मन को लुभाती हैं वादियाँ
अच्छे भविष्य के लिए माँ डाँटती भी है
बच्चों को सिर्फ़ किस्से सुनाती हैं दादियाँ

