Showing posts with label एक ताजा ग़ज़ल-मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ. Show all posts
Showing posts with label एक ताजा ग़ज़ल-मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ. Show all posts

Monday, 18 January 2021

एक ग़ज़ल-मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ

 

चित्र -साभार गूगल 


एक ताजा ग़ज़ल-
मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ

मौसम का सच छिपाती हैं शीशे की खिड़कियाँ
हँसकर के सारे ग़म को भुलाती हैं लड़कियाँ

खतरा सभी को रहता है यूँ अपने आस-पास
जब भी कटी उँगलियाँ, तो थीं अपनी खुरपियाँ

मिलती है गालियाँ उन्हें ईनाम कम मिले
सीने में ग़म छिपाये निकलती हैं वर्दियाँ

जो बुझ गए चराग़ उन्हें पूछता है कौन
जलते हुए दियों को बुझाती हैं आँधियाँ

मुश्किल बहुत है सच में पहाड़ों की जिन्दगी
फिर भी सभी के मन को लुभाती हैं वादियाँ

अच्छे भविष्य के लिए माँ डाँटती भी है
बच्चों को सिर्फ़ किस्से सुनाती हैं दादियाँ

कवि शायर-जयकृष्ण राय तुषार
चित्र -साभार गूगल 


एक पुराना लोकभाषा गीत -चुहुल ननद भौजाई कै

  चित्र साभार गूगल  एक पुराना लोकभाषा गीत  लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित...