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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -फूलों की वादियाँ
पर्वत, पठार, खेत, ये बादल, ये बिजलियाँ
चिड़ियों के साथ गातीं थीं फूलों की वादियाँ
धानी, हरी ये भूमि थी मौसम भी खुशनुमा
मुट्ठी में बंद कर हम उड़ाते थे तितलियाँ
किस्से तमाम घर की अंगीठी के पास थे
स्वेटर, सलाई, ऊन के जिम्मे थी सर्दियाँ
बहती नदी में रेत के टीले नहीं थे तब
दरिया के साफ़ पानी में तिरती थीं मछलियाँ
कोहबर के साथ हल्दी के छापों की याद है
मंडप बिना ही शहरों में होती हैं शादियाँ
मौसम का लोकरंग से रिश्ता था हर समय
झूलों के साथ गुम हुईं सावन में कजलियाँ
कवि /शायर
जयकृष्ण राय तुषार
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