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Sunday, 23 February 2020

एक गीत -सारे नकली ताल -तबलची


एक गीत--सारे नकली ताल-तबलची
कुरुक्षेत्र
के महारथी
सब गुणा-भाग में ।
धरना भी
प्रीपेड
हुआ शाहीन बाग़ में ।

जनता में
ईमान नहीं
हो गयी बिकाऊ,
लोकतंत्र
जर्जर, दीवारें
नहीं टिकाऊ,
जहरीले थे
और पंख
लग गए नाग में।

बिल्ली
बनकर रोज
प्रगति की राह काटते,
खबरों के
मालिक
अफ़ीम सी ख़बर बाँटते,
सारे नकली
ताल-तबलची
रंग-राग में ।

सत्ता की
मंशा कुछ,
मंशा कुछ विपक्ष की,
यज्ञ कुंड
हो गयी प्रजा
अब नृपति दक्ष की,
स्वप्न
दक्ष कन्या से
जलने लगे आग में ।

बिगड़ी
बोली-बानी
बिगड़ी है भाषाएं,
छंदहीन
हो गईं
किताबों में कविताएं,
गंध
उबासी
नकली फूलों के पराग में।

चित्र -साभार गूगल 

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