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Sunday, 12 July 2020

एक गीत -नींद से कहना न टूटे

चित्र साभार गूगल

एक गीत-नींद से कहना न टूटे

हँस रही
इन घाटियों के
माथ पर बिंदी हरी है ।

नींद से
कहना न टूटे
स्वप्न में इक जलपरी है ।

झील में
वंशी बजाते
गिन रहा है लहर कोई,
रक्तकमलों
से सुवासित
छू रहा है अधर कोई,

पंख
टूटेंगे न छूना
यार तितली बावरी है।

देह भींगी
भागती हैं
लाज से बोझिल दिशाएं,
खिड़कियों
के पार कोई
लिख रहा अपनी कथाएं,

छेड़ता है
रोज लेकिन
ज़ुर्म से मौसम बरी है ।

चाँदनी सी
रातरानी
रंग बेला के सुहाने,
अर्थ देने
लगे बिलकुल नए
सब गाने पुराने,

टांक लो
ये फूल जूड़े में
निवेदन आखिरी है ।


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

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