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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत-नींद से कहना न टूटे
हँस रही
इन घाटियों के
माथ पर बिंदी हरी है ।
नींद से
कहना न टूटे
स्वप्न में इक जलपरी है ।
झील में
वंशी बजाते
गिन रहा है लहर कोई,
रक्तकमलों
से सुवासित
छू रहा है अधर कोई,
पंख
टूटेंगे न छूना
यार तितली बावरी है।
देह भींगी
भागती हैं
लाज से बोझिल दिशाएं,
खिड़कियों
के पार कोई
लिख रहा अपनी कथाएं,
छेड़ता है
रोज लेकिन
ज़ुर्म से मौसम बरी है ।
चाँदनी सी
रातरानी
रंग बेला के सुहाने,
अर्थ देने
लगे बिलकुल नए
सब गाने पुराने,
टांक लो
ये फूल जूड़े में
निवेदन आखिरी है ।
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
