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| चित्र गूगल से साभार |
सुबह अब
देर तक सूरज
लगा सोने पहाड़ों में |
हमें भी
आलसी, मौसम
बना देता है जाड़ों में |
गुलाबी होंठ
हाथों में
लिए काफी जगाते हैं ,
लिहाफों में
हम बच्चों की
तरह ही कुनमुनाते हैं ,
न चढ़ती है
न खुलती
सिटकिनी ऊँचे किवाड़ों में |
कुहासे में
परिंदे राह
मीलों तक भटक जाते ,
कभी गिरकर के
पेड़ों की
टहनियों में अटक जाते ,
कोई कुश्ती में
धोबी पाट
दिखलाता अखाड़ों में |
नदी में
चोंच से
लड़ते हुए पंछी लगे तिरने ,
गगन में
सूर्य के घोड़े
कुहासे में लगे घिरने ,
हवा का
शाल पश्मीना
चिपक जाता है ताड़ों में |
किसी को भी
बुलाओ तो
नहीं अब सुन रहा कोई ,
नया आलू
अंगीठी में
पलटकर भुन रहा कोई ,
खनक
वैसी नहीं अब
रात में बजते नगाड़ों में |
