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Monday, 24 October 2011

एक गीत -महक रहा खुशबू सा मन

चित्र -गूगल से साभार 
मित्रों आप सभी को दीपावली की सपरिवार शुभकामनाएं |एक ताज़ा गीत आज सुबह लिखकर आपके लिए पोस्ट कर रहा हूँ |आज गांव जाना है तीस अक्टूबर तक अंतर्जाल से दूर रहूँगा तब तक के लिए विदा ले रहा हूँ |आज एक आश्चर्य हुआ मेरे ब्लॉग सुनहरी कलम पर किसी ने टिप्पड़ी किया मेरे ही ईमेल जैसा नाम बस एक अक्षर नहीं था |मैंने कमेंट्स डिलीट कर दिया |लेकिन यदि किसी ब्लॉग पर मेरे नाम से कोई भद्दा कमेंट्स हो तो मुझे क्षमा करेंगे |मैं लौटकर निगरानी करूँगा |मेरा कम्प्यूटर का ज्ञान  बस ब्लोगिंग तक सीमित है |लेकिन किसी ने दुबारा गलत हरकत किया तो साईबर क्राईम के अंतर्गत मुकदमा करने में भी नहीं हिचकूंगा |आप सभी का स्नेहाकांक्षी -जयकृष्ण राय तुषार 
आँगन में चंद्रमा उगा 
गेंदा के 
फूलों सी देह 
महक रहा खुशबू सा मन |
आंगन में 
चन्द्रमा उगा 
भर गया प्रकाश से गगन |

घी डूबी 
मोम सी उँगलियाँ 
रह -रह के बाती को छेड़तीं ,
लौ को जब 
छेड़ती हवाएँ 
दरवाजा हौले से भेड़तीं ,
टहनी में 
उलझा है आंचल 
पुरवाई तोड़ती बदन |

भाभी सी 
सजी हुई किरनें 
इधर उधर  चूड़ियाँ बजातीं ,
चौके से 
पूजाघर तक 
उत्सव के गीत गुनगुनातीं ,
लौटे कजरौटों 
के दिन 
काजल का आँख से मिलन |

मौन पिता 
बैठे दालान में 
आज हुए किस तरह मुखर ,
गंगासागर 
जैसी माँ 
गोमुख सी लग रही सुघर |
खिला -खिला 
गुड़हल सा मन 
संध्या के माथे चन्दन |
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 21 October 2011

एक गीत -सन्दर्भ -घर से दूर खड़ी दीवाली

चित्र -गूगल से साभार 
घर से दूर खड़ी दीवाली
घर से दूर 
खड़ी दीवाली 
सारी रात अमावस काली |

महालक्ष्मी 
गणपति बाबा 
धनकुबेर हो गए प्रवासी ,
फिर भी 
ले पूजा की थाली 
बाट जोहती पूरनमासी ,
संवरी बहू 
न बिंदिया चमकी 
फीकी है होठों की लाली |

मन में बस 
फुलझड़ियां छूटीं 
महंगाई के डर के मारे ,
घर -आंगन 
खपरैल -खेत में 
अंधकार ने पांव पसारे ,
घर की मलकिन 
उलटे -पलटे 
खाली जेबें बटुआ खाली |

हुई पीलिया ग्रस्त 
रोशनी 
सिकुड़ गयी दीये की बाती ,
उतर न पाया 
भूत कर्ज का 
उतर न पाई साढ़ेसाती ,
जितने भी 
सपने देखे थे 
सबके सब हो गए मवाली |
चित्र -गूगल से साभार 
[मेरा यह गीत जनसत्ता वार्षिकांक 2010[ कोलकाता से ]में प्रकाशित है ]

Monday, 10 October 2011

एक गीत -कालिख पुते हुए हाथों में

चित्र -गूगल से साभार 
कालिख पुते 
हुए हाथों में 
दिये दीवाली के |
कापालिक की 
कैद सभी
मंतर खुशहाली के |

हल टूटे हैं 
खेत रेहन में 
भरते मालगुजारी ,
सूदखोर 
के हाथ सरौते 
हम सब पान -सुपारी ,
पत्तल भी 
अदृश्य क्या देखें 
सपने थाली के ?

जादू -टोने 
तन्त्र -मंत्र सब 
करके हार गये ,
और अधिक 
पीड़ादायक 
निकले बेताल नये ,
इन्द्रप्रस्थ के 
रहें प्रजाजन 
या वैशाली के |

सरपंचों के 
घर -आंगन 
रोशनी नियानों की ,
हम 
बस्ती में रहते 
खस्ताहाल मकानों की ,
सोने में 
उछाल कान 
सूने घरवाली के |

सब नकली 
घी ,हव्य -
आचमन हवनकुंड में ,
बसे पुरोहित 
गांव छोड़ 
दादर ,मुलुण्ड में ,
ढूँढे से भी 
फूल नहीं 
मिलते शेफाली के |

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ में ...