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Tuesday, 1 March 2022

एक ग़ज़ल-अब अंधेरे में कोई हाथ दबाता है कहाँ

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-लौट के आता है कहाँ


नाव से उतरे मुसाफ़िर को बुलाता है कहाँ

जो भी उस पार गया लौट के आता है कहाँ


घाट संगम का,बनारस का या हरिद्वार का हो

सूखे दरिया को कोई फूल चढ़ाता है कहाँ


फूल की शाख से टूटे या हरे पेड़ों से

ऐसे पत्तों को कोई शख़्स उठाता है कहाँ


इस मोहब्बत में नज़ाकत न शराफ़त है कहीं

अब अंधेरे में कोई हाथ दबाता है कहाँ


अधजली बीड़ियाँ खलिहान जला देती हैं

वक्त पे अब्र कभी आग बुझाता है कहाँ


आम के पेड़ों पे तोते अभी गाते होंगे

बन्द पिंजरे में परिंदा कोई गाता है कहाँ


घर से बाहर भी कई घर थे मेरे दोस्त कभी

अब तो मुश्किल में कोई दोस्त भी आता है कहाँ

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


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