Saturday, 20 August 2022

एक गीत -हज़ारों फूल खिलते थे

चित्र साभार गूगल 


एक गीत -हजारों फूल खिलते थे


कोई भी

मूड,मौसम हो

मग़र हम साथ चलते थे.

यही वो रास्ते

जिन पर

हज़ारों फूल खिलते थे.


कहाँ संकोच से

नज़रें मिलाना

मुस्कुराना है,

कहाँ अब 

रूठने वाला कोई

किसको मनाना है,

यही मन्दिर था

जिसमें प्यार के

भी दिए जलते थे.


कहाँ अब

इत्र,खुशबू

तितलियों सा दिन सुहाना है,

कहाँ चेहरा

बदलकर

आईने का दिल लुभाना है,

यही ऑंखें थीं

जिनमें नींद

भी थी,ख़्वाब पलते थे.


कहाँ बज़रे पे

अब मौसम

कोई भी गीत सुनता है,

तुम्हारी

उँगलियों से

वक़्त अब स्वेटर न बुनता है,

कभी वो

चाँदनी,हम

रात तारों से निकलते थे

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Monday, 8 August 2022

एक देशगान -तीन रंग से सजा तिरंगा



एक देशगान -तीन रंग से सजा तिरंगा


तीन रंग से

सजा तिरंगा

हर घर में लहराए.

आज़ादी का

चन्दन वन यह

कभी नहीं मुरझाए.


जल थल नभ में

रहे प्रतिष्ठित

अपनी भारत माता,

शोषित, वंचित

दीन जनों का

भारत भाग्य विधाता,

राष्ट्रगान को

वेद मंत्र सा

सारी दुनिया गाए.


लाल चौक

पी. ओ. के. दिल से

वन्देमातरम बोले,

श्वेत कबूतर

केसर की

क्यारी में डैने खोले,

भारत की

हर बोली भाषा

सबके मन को भाए.


ज्ञान, कला, विज्ञान

संस्कृति

सबकी धारा हो,

यह बलिदानी

देश यहाँ

हर मौसम प्यारा हो,

अमृत महोत्सव

आज़ादी का

घर घर पर्व मनाए.


आज़ादी के लिए

मरे जो

वो शहीद, बलिदानी,

रामकथा सी

हर घर गूंजे

उनकी शौर्य कहानी,

इस मिट्टी का

बच्चा बच्चा

उनपर फूल चढ़ाए.


गंगा -जमुना

निर्मल रखना

निर्मल रहे हिमालय,

गिरिजाघर,

गुरुद्वारा, मस्जिद

सजा रहे देवालय,

सत्य अहिंसा

समरसता का

शिक्षक पाठ पढ़ाए.

कवि जयकृष्ण राय तुषार



एक गीत -हज़ारों फूल खिलते थे

चित्र साभार गूगल  एक गीत -हजारों फूल खिलते थे कोई भी मूड,मौसम हो मग़र हम साथ चलते थे. यही वो रास्ते जिन पर हज़ारों फूल खिलते थे. कहाँ संकोच से...