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| चित्र -साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -गमले को बोन्साई का बाज़ार चाहिए
गमले को बोन्साई का बाज़ार चाहिए
जब धूप लगे पेड़ सायादार चाहिए
घर भी बना तो उसको कहाँ चैन मिल सका
तख्ती पे लिक्खा था किराएदार चाहिए
विक्रम सा राजा हो तभी नवरत्न चाहिए
राजा हो जैसा वैसा ही दरबार चाहिए
कब तक दहेजमुक्त बनेगा समाज यह
बहुओं पे जुर्म बेटियों को प्यार चाहिए
मालिक भले हो झूठ -फ़रेबों के दरमियाँ
सेवक सभी को अपना वफादार चाहिए
नाटक की सफलताओं में ये बात जरूरी
जैसा हो रोल वैसा ही किरदार चाहिए
खबरों में अब मसाला ,मिलावट ,फरेब है
फिर भी सुबह की चाय पे अख़बार चाहिए
कर्तव्य भी हैं सबके इसी संविधान में
लेकिन सभी को अपना बस अधिकार चाहिए
कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार
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