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| चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
एक गीत -मानसून कब लौटेगा बंगाल से
ये सूखे बादल
लगते बेहाल से |
मानसून कब
लौटेगा बंगाल से ?
कजली रूठी ,झूले गायब
सूने गाँव ,मोहल्ले ,
सावन -भादों इस मौसम में
कितने हुए निठल्ले ,
सोने -चांदी के दिन
हम कंगाल से |
आंखें पीली
चेहरा झुलसा धान का ,
स्वाद न अच्छा लगता
मघई पान का ,
खुशबू आती नहीं
कँवल की ताल से |
नहीं पास से गुजरी कोई
मेहँदी रची हथेली ,
दरपन मन की बात न बूझे
मौसम हुआ पहेली ,
सिक्का कोई नहीं
गिरा रूमाल से |
फूलों के होठों से सटकर
बैठी नहीं तितलियाँ ,
बिंदिया लगती है माथे की
धानी -हरी बिजलियाँ ,
भींगी लटें नहीं
टकरातीं गाल से |
भींगी देह हवा से सटकर
जाने क्या बतियाती ,
चैन नहीं खूंटे से बंधकर
कजरी गाय रम्भाती ,
अभी नया लगता है
बछड़ा चाल से |
टकरातीं गाल से |
भींगी देह हवा से सटकर
जाने क्या बतियाती ,
चैन नहीं खूंटे से बंधकर
कजरी गाय रम्भाती ,
अभी नया लगता है
बछड़ा चाल से |
