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| चित्र -गूगल से साभार |
तुम्हारे
नहीं होने पर
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से
शाम मैं
खामोशियों में जागता -सोता |
तुम्हारे
साथ पतझर में
भी जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते
धुँए सा सिगरेट के,
अब चाँद दिखता है ,
भरे दरिया में
भी लगता है
जैसे जल नहीं होता |
नहीं हैं रंग
वो स्वप्निल
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे
फूल में खुशबू
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में
कोई खोया हुआ
बच्चा दिखा रोता |
मनाना
रूठना फिर
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में
मोहब्बत का
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर
का भारी बोझ
अब कोई नहीं ढोता |
किचन भी
हो गया सूना
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर
कोई कविता नहीं
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं
खूंटियों पर अब
कोई कपड़े नहीं धोता |
खिड़कियों से
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
लगाएं साथ गोता |

