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| चित्र साभार गूगल |
एक -ग़ज़ल -हजारों मील समंदर के पार है हिंदी
हरेक बागे अदब में बहार है हिन्दी
कहीं गुलाब कहीं हरसिंगार है हिन्दी
ये रहीम, दादू और रसखान की विरासत है
कबीर सूर और तुलसी का प्यार है हिन्दी
फिजी, गुयाना, मॉरीशस में इसकी खुश्बू है
हजारों मील समन्दर के पार है हिन्दी
महक खुलूस की आती है इसके नग्मों से
किसी हसीन की वीणा का तार है हिन्दी
जयकृष्ण राय तुषार
हरेक बागे अदब में बहार है हिन्दी
कहीं गुलाब कहीं हरसिंगार है हिन्दी
ये रहीम, दादू और रसखान की विरासत है
कबीर सूर और तुलसी का प्यार है हिन्दी
फिजी, गुयाना, मॉरीशस में इसकी खुश्बू है
हजारों मील समन्दर के पार है हिन्दी
महक खुलूस की आती है इसके नग्मों से
किसी हसीन की वीणा का तार है हिन्दी
जयकृष्ण राय तुषार
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