Wednesday, 5 September 2012

एक गीत -महाप्राण निराला को समर्पित -ओ सदानीरा निराला के सुनहरे गीत गाना

महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला 
एक गीत -महाप्राण निराला को समर्पित -
ओ सदानीरा निराला के सुनहरे गीत गाना 
पर्वतों की 
घाटियों से 
जब इलाहाबाद आना |
ओ सदानीरा !
निराला के 
सुनहरे गीत गाना |

आज भी 
'वह तोड़ती पत्थर '
पसीने में नहाये ,
सर्वहारा 
के लिए अब 
कौन ऐसा गीत गाये ,
एक फक्कड़ 
कवि हुआ था 
पीढ़ियों को तुम बताना |

'राम की थी 
शक्ति पूजा '
पर निराला गा रहे हैं ,
उस कथानक 
में निराला 
राम बनकर आ रहे है ,
अर्चना में 
कम न हो जाएँ 
कमल के फूल लाना |

आज भी है 
वहीं दारागंज 
संगम के किनारे ,
वक्त की 
लहरें मिटाकर 
ले गयीं पदचिन्ह सारे ,
ओ गगन 
जब गर्जना तो 
वही 'बादल राग 'गाना |

पूर्णिमा के 
ज्वार सा मन ,
वक्ष में आकाश सारा ,
वह 
इलाहाबाद का 
उसको इलाहाबाद प्यारा ,
मुश्किलों 
में भी न छोड़ा 
काव्य से रिश्ता निभाना |


वक्त  की 
पगडंडियों पर 
वह अकेला चल रहा था ,
आँधियों में 
एक जिद्दी दीप 
बनकर जल रहा था ,
जानते हैं 
सब  बहुत पर 
आज भी  वह कवि अजाना |

गोद बासन्ती 
मिली पर 
पत्थरों के गीत गाया ,
फूल 
साहूकार ,सेठों 
की तरह ही नज़र आया ,
छन्द तोड़ा 
मगर उसको 
छन्द आता था सजाना |
चित्र -गूगल से साभार 

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