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| महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला |
ओ सदानीरा निराला के सुनहरे गीत गाना
पर्वतों की
घाटियों से
जब इलाहाबाद आना |
ओ सदानीरा !
निराला के
सुनहरे गीत गाना |
आज भी
'वह तोड़ती पत्थर '
पसीने में नहाये ,
सर्वहारा
के लिए अब
कौन ऐसा गीत गाये ,
एक फक्कड़
कवि हुआ था
पीढ़ियों को तुम बताना |
'राम की थी
शक्ति पूजा '
पर निराला गा रहे हैं ,
उस कथानक
में निराला
राम बनकर आ रहे है ,
अर्चना में
कम न हो जाएँ
कमल के फूल लाना |
आज भी है
वहीं दारागंज
संगम के किनारे ,
वक्त की
लहरें मिटाकर
ले गयीं पदचिन्ह सारे ,
ओ गगन
जब गर्जना तो
वही 'बादल राग 'गाना |
पूर्णिमा के
ज्वार सा मन ,
वक्ष में आकाश सारा ,
वह
इलाहाबाद का
उसको इलाहाबाद प्यारा ,
मुश्किलों
में भी न छोड़ा
काव्य से रिश्ता निभाना |
पूर्णिमा के
ज्वार सा मन ,
वक्ष में आकाश सारा ,
वह
इलाहाबाद का
उसको इलाहाबाद प्यारा ,
मुश्किलों
में भी न छोड़ा
काव्य से रिश्ता निभाना |
वक्त की
पगडंडियों पर
वह अकेला चल रहा था ,
आँधियों में
एक जिद्दी दीप
बनकर जल रहा था ,
जानते हैं
सब बहुत पर
आज भी वह कवि अजाना |
गोद बासन्ती
मिली पर
पत्थरों के गीत गाया ,
फूल
साहूकार ,सेठों
की तरह ही नज़र आया ,
छन्द तोड़ा
मगर उसको
छन्द आता था सजाना |

