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Friday, 15 July 2011

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक 
मौसम तो खुशगवार बहुत  वादियों में है 
मेरा सफर तमाम मगर सर्दियों में है 

ये सोचकर परिंदे भी उड़ते चले गए 
रहते थे जिस दरख्त पे वो आंधियों में है 

डर आदमी को है या सियासत का खेल ये 
क़ातिल शिकार से भी अधिक सुर्ख़ियों में है 

हीरा हुआ वो ,भाग्य मेरा कोयला हुआ 
मेरा भी जन्म लग्न उन्हीं राशियों में है 

कुछ भी कहा न तुमने मगर मैं समझ गया 
कुछ व्याकरण अजीब तेरी कनखियों में है 

गुजरा हरेक शख्स इधर देखता हुआ 
पूनम का कोई चाँद इन्ही खिड़कियों में है 

नाजुक मिजाज़ कह के नहीं भेद -भाव कर 
अब जंग का हुनर भी यहाँ लड़कियों में है 
दो 
खौफ़ का कितना हसीं मंजर था मेरे सामने 
हर किसी के हाथ में पत्थर था मेरे सामने 

अम्न की बातें परिंदे कैसे मेरी मानते 
रक्त में डूबा हुआ इक पर था मेरे सामने 

प्यार से जब खेलते बच्चे को चाहा चूमना 
मैं वक्त का पाबंद था दफ्तर था मेरे सामने 

अब तलक भूली नहीं बचपन की मुझको वो सजा 
मैं खड़ा था धूप में और घर था मेरे सामने 

पार भी करता मैं वो दरिया तो कैसे दोस्तों 
फिर बगावत में खड़ा लश्कर था मेरे सामने 

जन्म दिन पर तेरे कैसे भेंट करता फूल मैं 
सहरा था मेरे सामने बंजर था मेरे सामने 

जो भी इन्सा थे उन्हें ठोकर मिली गाली मिली 
देवता बनकर खड़ा पत्थर था मेरे सामने  
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
[मेरी दोनों ही ग़ज़लें पुरानी और प्रकाशित हैं ]

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ में ...