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Sunday, 23 January 2022

एक ग़ज़ल-तुम्हारा चाँद तुम्हारा ही आसमान रहा

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-तुम्हारा चाँद, तुम्हारा ही आसमान रहा


हवा में,धूप में,पानी में फूल खिलते रहे

हज़ार रंग लिए ख़ुशबुएं बदलते रहे


बड़े हुए तो सफ़र में थकान होने लगी

तमाम बच्चे जो घुटनों के बल पे चलते रहे


सुनामी,आँधियाँ, बारिश,हवाएँ हार गईं

बुझे चराग़ नई तीलियों से जलते रहे


जहाँ थे शेर के पंजे वही थी राह असल

नए शिकारी मगर रास्ते बदलते रहे


तुम्हारा चाँद तुम्हारा ही आसमान रहा

मेरी हथेली पे जुगनू दिए सा जलते रहे


कुँए के पानियों को प्यास की ख़बर ही कहाँ

हमारे पाँव भी काई में ही फिसलते रहे


सफ़र में राह बताकर वो हमको लूट गया

उसी के कारवाँ के साथ हम भी चलते रहे

कवि-जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


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