![]() |
| गुलमोहर [चित्र -साभार गूगल ] |
एक गीत -कहीं तो होगा हरापन
छटपटाते
प्यास से
व्याकुल हिरन के प्रान |
और नदियों
के किनारे
शब्द भेदी बान |
जल रहे हैं
वन ,नशीली
आँधियों के दिन ,
हवा जूड़े
खोलकर के
ढूँढती है पिन ,
झील की
लहरें अचंचल
डूबता दिनमान |
निर्वसन
हैं खेत ,
धानी दूब वाली मेड़ ,
चटख फूलों
से भरे
गुलमोहरों के पेड़ ,
बन्द आँखे
मगर आहट
सुन रहे हैं कान |
हँस रहीं हैं
मारिचिकाएँ
कर रहीं उपहास,
हर कदम
विभ्रम नहीं
बुझती पथिक की प्यास,
कहीं तो
होगा हरापन
और नखलिस्तान ।
धूल उड़ती
देखती
गोधूलि बेला ,शाम ,
माँ अकेले
जप रही है
कहीं सीताराम !
स्वप्न फिर
आषाढ़
बनकर रोपते हैं धान |
कवि -जयकृष्ण राय तुषार


