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| चित्र -साभार गूगल |
एक ताज़ा -ग़ज़ल-नया शेर सुनाता हूँ कहाँ
अपने बच्चों से कभी सच को बताता हूँ कहाँ
इसलिए ख़्वाब में परियाँ हैं मैं आता हूँ कहाँ
हर किसी दौर में,तू मीर के दीवान में है
तुझको पढ़ता हूँ नया शेर सुनाता हूँ कहाँ
मेरी आँखें हैं मेरी नींद भी सपना भी मेरा
मैं सियासत की तरह ख़्वाब दिखाता हूँ कहाँ
जिन्दगी, शेर,बहर, नुक़्ते में उलझाती रही
घर मेरा ज़ुल्फ़ सा बिखरा है सजाता हूँ कहाँ
मोतियाँ ,सीपियाँ सब ले गए जाने वाले
मैं समंदर हूँ हलाहल को दिखाता हूँ कहाँ
