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| चित्र -गूगल से साभार |
इन आँखों ने देखा है अफ़साना भी नहीं है
वो यारों मोहब्बत का दीवाना भी नहीं है
अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
इस बार किसी ज़ाल में दाना भी नहीं है
इक दिन की मुलाकात से गफ़लत में शहर है
सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है
वो ढूंढ़ता फिरता है हरेक शै में ग़ज़ल को
अब मीर ओ ग़ालिब का जमाना भी नहीं है
फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत
मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है
हर मोड़ पे वो राह बदल लेता है अपनी
गर दोस्त नहीं है तो बेगाना भी नहीं है
इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी
इस शहर में तो कोई मयखाना भी नहीं है
[कुछ दिनों से व्यस्तता वश लिखना नहीं हो पा रहा है ,एक पुरानी कामचलाऊ ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ ]
[कुछ दिनों से व्यस्तता वश लिखना नहीं हो पा रहा है ,एक पुरानी कामचलाऊ ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ ]
