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| चित्र साभार गूगल |
चाँद की महफ़िल में हर दिन इतराता है
प्यासा बादल ही दरिया तक आता है
गुलशन में ही फूल, तितलियाँ मत ढूंढो
मौसम जूड़े में भी फूल खिलाता है
सूरदास को दरबारों से क्या लेना
वह तो वृंदावन को गीत सुनाता है
रिश्ते नाते गाँव -शहर में भूल गए
गाँव का मौसम अब भी रोज बुलाता है
वनवासी प्रभु को छोड़ा इंसानों ने
वानर कुल मुश्किल में साथ निभाता है
खिड़की से परदा थोड़ा सा खिसका है
कोई होने का अहसास दिलाता है
फूल पे बैठी तितली भौँरे चले गए
भींगे मौसम से पत्थर बतियाता है
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| महाकवि सूरदास चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |



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