Tuesday, 21 September 2021

एक गीत-चाँदनी निहारेंगे

 

चित्र साभार गूगल

एक गीत-चाँदनी निहारेंगे


रंग चढ़े

मेहँदी के

मोम सी उँगलियाँ हैं ।

धानों की

मेड़ों पर

मेघ की बिजलियाँ हैं।


खुले हुए

जूड़े और

बच्चों के बस्ते,

हँसकर के

खिड़की से

सूर्य को नमस्ते,

फूलों का

माथ चूम

उड़ रहीं तितलियाँ ।


ढूंढ रहे

अर्थ सुबह

रातों के सपने,

रखकर

ताज़ा गुलाब

पत्र लिखा किसने,

आटे की

गोली सब

खा गयीं मछलियाँ ।


आहट

दीवाली की

किस्से रंगोली के,

दिन लौटे

दिए और

पान-फूल रोली के

चाँदनी

निहारेंगे छत

आँगन-गलियाँ ।



Thursday, 16 September 2021

एक गीत-हिंदी रानी माँ सी

 


एक गीत-हिंदी रानी माँ सी


पखवाड़ा भर

पूजनीय है

बाकी दिन है दासी ।

सिंहासन अब

उसे सौंप दो

हिंदी रानी माँ सी ।


किसी राष्ट्र का

गौरव उसकी

आज़ादी है भाषा ,

संविधान के

षणयंत्रों से

हिंदी बनी तमाशा,

पढ़ती रही

ग़ुलामों वाली

भाषा दिल्ली,काशी ।


कैसा है

वह राष्ट्र न 

जिसकी अपनी बोली-बानी,

टेम्स नदी में

ढूंढ रहे हम

गंगाजल सा पानी,

गढ़ो राष्ट्र की

मूरत सुंदर

सीखो संग तराशी ।


बाल्मीकि,

तुलसी,कबीर हैं

निर्मल जल की धारा,

भारत अनगिन

बोली,बानी का

है उपवन प्यारा,

अपनी संस्कृति

और सभ्यता

कभी न होगी बासी ।

जयकृष्ण राय तुषार



Wednesday, 8 September 2021

एक देशगान-उस भारत का अभिनन्दन है

 


एक देशगान-उस भारत का अभिनन्दन है


जिसका पानी

गंगाजल है

हर पेड़ जहाँ का चन्दन है।


जिसकी झीलों में

कमल पुष्प

उस भारत का अभिनन्दन है।


जिसकी सुबहें

सोने जैसी 

दिन रजत ,ताम्र संध्याएँ हैं,

जिसके हिमगिरि

नभ,चाँद सुभग

वेदों संग परीकथाएँ हैं,

जिसके सागर में

रत्न सभी

जिसका हर उपवन नन्दन है।


जहाँ राम कृष्ण

शिव तिरुपति हैं

ऋषियों मुनियों के पुण्य धाम,

जहाँ सत्य अहिंसा

परम धर्म

जहाँ गौ को माँ का दिए नाम,

जिसमें अनगिन

ऋतुएँ, मौसम

सूरज का मणिमय स्यंदन है।

जहाँ एकलव्य

उद्दालक हैं

शिबि,कर्ण, दधीचि से दानवीर,

जहाँ व्यास पाणिनि

शंकर हैं

जहाँ बाल्मीकि,तुलसी,कबीर,

जहाँ सीता,गीता

सावित्री और

अनुसूया का वन्दन है।

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

भारत माता


Wednesday, 1 September 2021

एक सामयिक ग़ज़ल-बम औ बंदूक से दुनिया है परेशान मियां

 


एक सियासी ग़ज़ल मौजूदा स्थिति पर


मुल्क को मुल्क बनाते हैं बस इन्सान मियां

बम औ बंदूक से दुनिया है परेशान मियां


नाम हमदर्दी का साज़िश है बड़े लोगों की

बन्द बोतल से निकल आये हैं शैतान मियां


औरतों,बच्चों को क़ातिल के हवाले करके

अपने ही मुल्क से धोखा किये अफ़गान मियां


ख़्वाब कश्मीर का अब देखना छोड़ो प्यारे

सन इकहत्तर को नहीं भूलना इमरान मियां


हम अहिंसा के पुजारी है मगर याद रहे

है निहत्था नहीं कोई मेरा भगवान मियां



Monday, 30 August 2021

एक गीत सामयिक-फिर बनो योगेश्वर कृष्ण

 


एक सामयिक गीत

फिर बनो योगेश्वर कृष्ण


फिर बनो

योगेश्वर कृष्ण

उठो हे पार्थ वीर ।

हे सूर्य वंश के

राम

उठा कोदण्ड- तीर ।


जल रहा

शरीअत की

भठ्ठी में लोकतंत्र,

अब भारत

ढूंढे विश्व-

शान्ति का नया मन्त्र,

भर गयी

राक्षसी 

गन्धों से पावन समीर।


इन महाशक्तियों

के प्रतिनिधि

अन्धे, बहरे,

ये सभी

दशानन हैं

इनके नकली चेहरे,

सब अपने

अपने स्वार्थ

के लिए हैं अधीर।


इतिहास

लिखेगा कैसे

इस युग को महान,

नरभक्षी

रक्तपिपासु

घूमते तालिबान,

रावलपिंडी

दे रही

इन्हें मुग़लई खीर ।



Monday, 23 August 2021

एक गीत-रख गया मौसम सुबह अंगार फूलों पर

 


एक गीत-रख गया मौसम सुबह अंगार फूलों पर


रख गया

मौसम 

सुबह अंगार फूलों पर ।


वक्त पर

लम्बे-घने

तरु भी हुए बौने,

रेत 

नदियों में

पियासे खड़े मृगछौने,

ताक में

अजगर

शिकारी नदी कूलों पर ।


सूर्य भी

छिपने लगा 

है बादलों के घर,

हो गए हैं

सभ्यता के

आज कातर स्वर,

घोसलों पर,

चील के 

कब्जे बबूलों पर ।


हो गयी

दुनिया तमाशा

वक्त भी बुज़दिल,

अब अहिंसा से

विजय का

पथ हुआ मुश्किल,

इस सदी में

कौन कायम

है उसूलों पर ।

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


एक देशगान-फिर शांति अचम्भित,विस्मित है

 


देशगान-फिर शांति अचंभित,विस्मित है


जागो भारत के

भरतपुत्र

सरहद पर कर दो शंखनाद ।

फिर शांति 

अचम्भित, विस्मित है

फिर मानवता के घर विषाद ।


हो गयी 

अहिंसा खण्ड-खण्ड

हे बामियान के बुद्ध देख,

स्त्री,बच्चों 

लाचारों से

अब कापुरुषों का युद्ध देख,

बन शुंग,शिवाजी

गोविन्द सिंह,रण में

दाहिर को करो याद ।


बीजिंग,लाहौर

कराची का फिर

आँख मिचौनी खेल शुरू,

घर में सोए

गद्दारों का

षणयंत्र शत्रु से मेल शुरू,

इस बार 

शत्रु का नाम मिटा

हो अंतरिक्ष तक सिंहनाद।


वीटो वाले

दुबके घर में

इनको पसंद कोलाहल है,

नेतृत्व बने

अब महाकाल

दुनिया विष उदधि हलाहल है,

असुरों पर

फेंकों अब त्रिशूल

ताण्डव हो डमरू का निनाद ।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार

सभी चित्र साभार गूगल


Wednesday, 18 August 2021

एक सांकेतिक गीत-वह राम विजय ही पाएगा

 


एक सामयिक सांकेतिक गीत-वह राम विजय ही पाएगा


रावण कितना

बलशाली हो

हर युग में मारा जाएगा ।

जिसका

चरित्र उज्ज्वल होगा

वह स्वयं राम हो जाएगा ।


सिंहासन का

परित्याग किये,

अपहरण राम कब करते हैं,

केवट से

विनती करके ही

गंगा के पार उतरते हैं,

जो सबका

आँसू पोछेगा

वह राम विजय ही पाएगा ।


स्त्री,बच्चों पर

जुल्म करे जो

कायर ,नहीं प्रतापी है,

जो खड़ा 

समर्थन में इनके

वह युगों-युगों का पापी है,

मुट्ठी भर

सूरज का प्रकाश 

मीलों तक तम को खाएगा ।


वह नहीं

राष्ट्र का नायक है

जो रण में पीठ दिखाता है,

जो मरे 

राष्ट्र की रक्षा में

युग-युग तक पूजा जाता है,

तूफ़ान 

गिरा दे पेड़ भले

पर्वत से क्या टकराएगा ।


हर भाँति

प्रजा के मंगल

के खातिर होता सिंहासन है,

कुछ दूर

हमारी सरहद से

धृतराष्ट्र,शकुनि,दुःशासन है,

फिर चीरहरण

से महाशक्तियों

का मस्तक झुक जाएगा ।


कवि -जयकृष्ण राय तुषार

Saturday, 14 August 2021

 

साहित्य मनीषी और आज़ादी के महानायक
पुरुषोत्तम दास टंडन

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान को समर्पित एक गीत


माँ भारती का गर्व है ये भाषा का विहान है

यह अवध की शान है ये हिंदी संस्थान है 


यह काव्य की उपासना है मन्दिरों की आरती

श्रेष्ठ हैं सम्मान सब शिखर है भारत भारती

यह भाषा ,छंद,व्याकरण,विमर्श को सँवारती

परंपरा के साथ धर्म ,ज्ञान और विज्ञान है

यह अवध की शान है यह हिंदी संस्थान है ।


पुरुषोत्तम दास टण्डन जी के स्वप्न का शिखर यही

हिंदी के साथ-साथ सभी बोलियों का घर यही

भक्ति,रीतिकाल और वर्तमान स्वर यही

यह हिंदी राष्ट्र एकता की प्रेरणा महान है

यह अवध की शान है ये हिंदी संस्थान है


भाषा यह गूँजी विश्व में अटल जी का प्रयास है

इस हिंदी पुष्प गन्ध का अनन्त में सुवास है

परिचर्चा,खंडकाव्य शोधग्रन्थ का लिबास है

इस राष्ट्र के गौरव का उसकी सभ्यता का गान है

यह अवध की शान है ये हिंदी संस्थान है


कवि-जयकृष्ण राय तुषार



साहित्य मनीषी और आज़ादी के महानायक पुरुषोत्तमदास टंडन जी और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ।चित्र साभार गूगल

Friday, 13 August 2021

एक गीत-बाढ़ की विभीषिका पर /पानी में डूब गए पेड़ हरसिंगार के

 


एक गीत -बाढ़ की विभीषिका पर 


डूब गए

पानी में

पेड़ हरसिंगार के।

स्वप्न गिरे

औंधे मुँह

पूजा और प्यार के ।


द्वार-द्वार

गंगा और

जमुना की लहरें हैं,

बस्ती में

नावें हैं

मदद और पहरे हैं,

कजली चुप

फीके रंग

सावनी फुहार के ।


नदियों के

पेटे में

एक नया प्रयाग है,

चूल्हों में

पानी है

बुझी हुई आग है,

मछली सा

तैर रहे

आदमी कछार के ।


जिनके 

घर-बार

हुए वो भी बंजारों से,

खतरा है

नदियों के

टूटते किनारों से,

चाँदनियों 

के चेहरे

हैं बिना सिंगार के ।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार


चित्र साभार गूगल


एक गीत-चाँदनी निहारेंगे

  चित्र साभार गूगल एक गीत-चाँदनी निहारेंगे रंग चढ़े मेहँदी के मोम सी उँगलियाँ हैं । धानों की मेड़ों पर मेघ की बिजलियाँ हैं। खुले हुए जूड़े और ब...