Friday, 1 July 2022

एक सामयिक गीत -शाम जुलाई की

भगवान जगन्नाथ जी 


एक ताज़ा गीत -शाम जुलाई की 


भीनी -सोंधी

गंध लिए है

शाम जुलाई की.

गूंज रही

आवाज़ हवा में

तीजनबाई की.


जगन्नाथ प्रभु

की मंगल

रथयात्रा जारी है,

मन मीरा

चैतन्य हो गया 

भक्ति तुम्हारी है,

तुमने कर दी

कथा अमर

प्रभु सदन कसाई की.


धूल भरे

पत्तों पर बूंदे

गंगासागर की,

लौटी सगुन

घटाएँ फिर से

सूने अम्बर की,

पटना वाली

भाभी करतीं

बात भिलाई की.


थके -थके से

पेड़ सुबह

अब देह तोड़ते हैं,

इंद्रधनुष

छाते घर से 

स्कूल छोड़ते हैं,

लुका -छिपी है

धूप -चाँह

बिजली, परछाई की.


बेला महकी

हरसिंगार

रातों को जाग रहे,

मोर नाचते

वन में

बेसुध चीतल भाग रहे,

मेहंदी से

फिर रौनक़ लौटी

हलद कलाई की.


जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


चित्र साभार गूगल 

Monday, 13 June 2022

एक ग़ज़ल -वो तो सूरज है

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -वो तो सूरज है


इन चरागों को तो आँचल से बुझा दे कोई

वो तो सूरज है जला देगा हवा दे कोई


मैं हिमालय हूँ तो चट्टानों से रिश्ता है मेरा

आम का फल नहीं पत्थर से गिरा दे कोई


माँ सी तस्वीर ये भारत की दिलों में सबके

चाहता है तू ये तस्वीर जला दे कोई


आग पी जाता हूँ सागर भी मैं सैलाब भी हूँ

सिरफ़िरा अब नहीं शोलों को हवा दे कोई


अब सियासत से सितारों को बचाना होगा

भींगते फूल सा मौसम को फ़ज़ा दे कोई


किसकी साजिश थी हरे वन को जला देने की

सूखते पेड़ को पत्ता अब हरा दे कोई


होंठ पर ठुमरी हो कव्वाली हो या प्रभु का भजन

शाम ख़ामोश है महफ़िल तो सजा दे कोई

जयकृष्ण राय तुषार


चित्र साभार गूगल 

Saturday, 11 June 2022

कुछ सामयिक दोहे

चित्र साभार गूगल 


कुछ सामयिक दोहे


कोई भी संगीत दे चित्रा या ख़य्याम

अब से पत्थरबाज़ हो कभी न कोई शाम


औरों से कहिए नहीं अपने घर की बात

अंधेरा कब चाहता हो पूनम की रात


मन्दिर -मस्जिद, चर्च में रहे शांति पैगाम

तुझमें है तेरा ख़ुदा  मुझमें मेरा राम


भारत माँ युग युग रहे तेरी कीर्ति अशेष

गंगाजल सा पुण्य दें ब्रह्मा, विष्णु, महेश 


भारत की रज भूमि में देवों का संसार

अर्जुन का गाण्डीव यह पोरस की तलवार


तार -तार मत कीजिए संविधान, क़ानून

लोगों तक मत भेजिए नफ़रत का मज़मून


पापी को मिलता कहाँ कभी पुण्य का धाम

अपराधी की छावनी बुलडोज़र के नाम 


बनना है तुलसी बनो, कबीरा औ रसखान

मुँह से मीठा बोलिए खाकर मगही पान


अतिथि प्रेम बंधुत्व की भारत एक मिसाल

इसके नभ में इंद्रधनु सागर सीप, प्रवाल


जिनके कर्मों से मिला सदा राष्ट्र को मान

सदियों तक उस राष्ट्र को रहता है अभिमान


प्रेम, शांति, सौहार्द से जीवित यह संसार

ज्यादा दिन चलती नहीं खिलजी की तलवार


हर दिन मौसम गर्म है गायब, तितली, फूल

बच्चे लावा हो गए कैसे ये स्कूल


दुनिया पहुँची  चाँद पर फिर भी हम हैरान

फिर भी कोई सच नहीं कहता हे भगवान


स्त्री माँ का रूप है उसको दो सम्मान

पूरी लंका जल गयी सिर्फ एक अपमान


गंगाजल में चन्द्रमा या यमुना में चाँद

दोनों में छवि एक है फिर कैसा उन्माद

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Thursday, 9 June 2022

गंगा दशहरा -एक गीत

गंगा अवतरण 


आजगंगा दशहरा का पावन पर्व है


जगत को शीतलता हरीतिमा और जीवन देने वाली माँ गंगा का अवतरण दिवस है. माँ गंगा की निर्मलता और   आशीष समस्त भारतवासियों को मिलता रहे.हर हर गंगे


एक पुराना गीत


गोमुख से भू पर बहती

ओ गंगा तुझे नमन

जन -जन के मन मेंबहती

ओ गंगा तुझे नमन


मोक्षदायिनी है माँ गंगा

पापहारिणी है

शिव की सघन जटा से निकली

जगततारिणी है

दुर्गम पथ में आतप सहती

माँ गंगा तुझे नमन


गंगा तेरा जल अमृत है

सबको जीवन देता

तेरी महिमा से हर नाविक

अपनी नैया खेता

सबकी प्यास बुझाकर दहती

माँ गंगा तुझे नमन


तुम गायत्री, तुम सावित्री

तुम ही गीता हो

तुम हो वेद, पुराणों में माँ

तुम ही सीता हो

युग -युग राम कथा कहती

ओ गंगा तुझे नमन.

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Sunday, 5 June 2022

एक देशगान -हर बच्चा गोरा -बादल हो

चित्र साभार गूगल 


एक देशगान -हर बच्चा गोरा -बादल हो(इतिहास प्रसिद्ध वीर योद्धा जिन्होंने खिलजी से राजा रत्नसेन को मुक्त कराया था )


फिर सरहद पर

हो शंखनाद

तुरही, नक्कारा, मादल हो.

इस भारत माँ 

की मिट्टी में

हर बच्चा गोरा -बादल हो.


हल्दी घाटी का

शौर्य देख

इसका हर कण -कण चंदन है,

यह स्वर्ग

यहाँ रामायण

गीता, सीता का अभिनन्दन है,

मुख में

ब्रह्माण्ड लिए कान्हा

मस्तक पर टीका, काजल हो.


निर्मित कर

फिर से नालंदा

संदीपनी आश्रम तक्षशिला,

चाणक्य

गढ़ो फिर चन्द्रगुप्त

घननंदों का साम्राज्य हिला,

केरल हो या कश्मीर

सभी की

झीलों में अब शतदल हो.


जो लक्षागृह तक

जाता हो

हे पाण्डुपुत्र वह मार्ग बदल,

जिसमें

शतरंज शकुनि का हो

उस राजमहल से तुरत निकल,

उस पर

अंकुश से वार करो

जो हाथी मद में पागल हो.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Saturday, 28 May 2022

एक गीत -कोई तो वंशी को स्वर दे

 

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -कोई तो वंशी को स्वर दे

मन के सूने

वृंदावन को

कोई तो वंशी का स्वर दे.

यह पठार था

फूलों वाला

मौसम फिर फूलों से भर दे.


सुविधाओं के

कोलाहल में

कविताओं के अर्थ खो गए,

साजिन्दे

सारंगी लेकर

रंगमहल के बीच सो गए,

ठुमरी का

आलाप सुनाकर

कोई जादू -टोना कर दे.


अभिशापित

किष्किन्धाओं को

कोई साथी मिले राम सा,

शबरी जैसा

प्रेम जहाँ हो

वह वन प्रांत्रर पुण्य धाम सा,

धूल भरे

मौसम में उड़ना

कोई तो जटायु सा पर दे.


कहाँ खो गए

कमल पुष्प वो

झीलों से बतियाने वाले,

बिछिया पहने

नज़र झुकाकर

मंद मंद मुस्काने वाले,

आँगन -आँगन

रंग खिलेंगे

कोई पाँव महावर धर दे.


अबके सावन

गीत लिखूँगा

जूड़े -जूड़े बेला महके,

चातक प्यास

बुझाए अपनी

डाल -डाल पर पंछी चहके,

कोई दरपन में

अपने ही

अधरों पर अधरों को धर दे.

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Wednesday, 25 May 2022

एक ग़ज़ल -भारत की ये तस्वीर है

भारत माता 


एक ग़ज़ल -भारत माँ को समर्पित


फ़िर साफ़ करो हो गयी तस्वीर पुरानी

भारत की ये तस्वीर है गौरव की निशानी


ये कृष्ण की वंशी है सियाराम की गाथा

इस देश में अमृत सा सभी नदियों का पानी


तस्वीर ये छोटी है ये तस्वीर बढ़ा दो

कुछ और बड़ी कर दो इकहत्तर की कहानी


इस देश का की सरहद कभी इतनी न थी छोटी

इस बार बदल देना पी.ओ.के के मानी


इस मुल्क को फ़िर सोने की चिड़िया में बदल दो

कुछ रंग नया भर दो फज़ाएँ हों सुहानी

जयकृष्ण राय तुषार 

माननीय प्रधानमंत्री 


Sunday, 22 May 2022

एक गीत -कवि माहेश्वर तिवारी



गीतकवि माहेश्वर तिवारी अपनी पत्नी श्रीमती बाल सुंदरी तिवारी संग 


मुरादाबाद यात्रा के दौरान हिंदी के अप्रतिम गीतकार आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी ने अपना गीत संग्रह हरसिंगार कोई तो हो भेंट किया. माहेश्वर जी जो लिखते हैँ वही मंच पर गुनगुनाते भी हैँ अर्थात गीत का स्तर नहीं गिरने देते. यह उन गीतकारों में हैँ जिन्होंने हिंदी नवगीत ही न हीं कविता के मंचों को भी फूहड़ होने से बचाया. भवानी प्रसाद मिश्र, गोपाल सिंह नेपाली, नीरज, रमानाथ अवस्थी, वीरेंद्र मिश्र, डॉ शम्भूनाथ सिंह, डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया ठाकुर प्रसाद सिंह, उमा शंकर तिवारी, श्रीकृष्ण तिवारी बुद्धिनाथ मिश्र उमाकांत मालवीय कैलाश गौतम, बच्चन, शिव मंगल सिंह सुमन जैसे कवियों का सानिध्य माहेश्वर जी का रहा. माहेश्वर जी  यश भारती से सम्मानित कवि हैँ, माहेश्वर जी के गीत हरसिंगार, बेला और गुड़हल की मोहक सुगंध लिए पाठकों के दिल में उतरते जाते हैँ. माहेश्वर जी यायावर

गीत कवि रहे, जन्म बस्ती शिक्षा गोरखपुर, बनारस मध्य प्रदेश भ्रमण करते करते पीतल नगरी मुरादाबाद में बस गए.सादर 


एक गीत -श्री माहेश्वर तिवारी


सारे दिन पढ़ते अख़बार

बीत गया यह भी इतवार


गमलों में 

पड़ा नहीं पानी

पढ़ी नहीं गई

संत वानी


दिन गुजरा

बिलकुल बेकार

सारे दिन

पढ़ते अख़बार

पुंछी नहीं

पत्रों की गर्द

खिड़की -

दरवाज़े बेपर्द


कोशिश की है

कितनी बार

सारे दिन

पढ़ते अख़बार


मुन्ने का

तुतलाता गीत

अनसुना

गया बिलकुल बीत


कई बार

करके स्वीकार

सारे दिन

पढ़ते अख़बार

कवि /गीतकार माहेश्वर तिवारी

पुस्तक 


एक ग़ज़ल -नगर अनजान है प्यारे


महाप्राण निराला 


एक ग़ज़ल -निराला से निराला का नगर अनजान है प्यारे

निराला से निराला का नगर अनजान है प्यारे
जमी है धूल जिस पर मीर का दीवान है प्यारे

इलाहाबाद में अकबर सा अब शायर कहाँ कोई
गलाबाज़ी हो जिसमें कुछ वो गौहरज़ान है प्यारे

मुनादी है कहीं फिर आलमी शोअरा की महफ़िल है
गली, कूचों में भी जिनकी नहीं पहचान है प्यारे 

ग़ज़ल में, गीत में कोई बहर या क़ाफिया कुछ हो
किताबों के वरक पर ख़ुशनुमा उनवान है प्यारे

निज़ामत मसखरों की और सदारत भी सियासी है 
अदब की शायरी इस दौर में बेज़ान है प्यारे

उसे हर एक जुमले पर मुसलसल दाद मिलती है
नयन तीखे गुलाबी फूल सी मुस्कान है प्यारे

विचारों से नहीं मतलब वो हर दरबार में हाजिर
यहाँ शायर बिना चूने का मगही पान है प्यारे

कला, संस्कृति, की संस्थाएं भी पोषित चाटुकारों से
इन्हीं कव्वालों की होली भी औ रमजान है प्यारे 

नए शागिर्द महफ़िल में बड़े उस्ताद घर बैठे
बनारस के घराने में भी अब सुनसान है प्यारे 

जयकृष्ण राय तुषार 

मीर तकि मीर 


Sunday, 15 May 2022

एक ग़ज़ल -मुझको बदलते दौर की वो हीर चाहिए

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -हिन्दी ग़ज़ल को भी तो कोई मीर चाहिए

अपनी ज़मीन पर नई तामीर चाहिए
शेर-ओ- सुखन को इक नई तस्वीर चाहिए

महफ़िल में अब भी सुनता हूं दुष्यन्त की ग़ज़ल
हिन्दी ग़ज़ल को अब भी  कोई मीर चाहिए

गैंता, कुदाल मेरे,जिसे बाँसुरी लगें
मुझको बदलते दौर की वो हीर चाहिए

पंडित हों, जिसमें, डोंगरी, कश्मीरियत भी हो
मुझको वही चिनाब वो कश्मीर चाहिए

भाषा, कहन नई, नया सौंदर्य बोध हो
हिन्दी ग़ज़ल की सीता को रघुवीर चाहिए 

पिंजरे को तोड़कर के परिंदे उड़ान भर
बस हौसले को थोड़ी सी तक़दीर चाहिए

अपने ख़याल ख़्वाब बुलंदी के वास्ते
ग़ालिब, न, दाग, जौक़ नहीं मीर चाहिए 

कवि जयकृष्ण राय तुषार
चित्र साभार गूगल 


एक सामयिक गीत -शाम जुलाई की

भगवान जगन्नाथ जी  एक ताज़ा गीत -शाम जुलाई की  भीनी -सोंधी गंध लिए है शाम जुलाई की. गूंज रही आवाज़ हवा में तीजनबाई की. जगन्नाथ प्रभु की मंगल रथ...