Friday, 25 November 2022

नए वर्ष का गीत -स्वस्ति लिए आना तुम

चित्र साभार गूगल 


नववर्ष का मंगल गीत -स्वस्ति लिए आना तुम

होठों पर

वंशी ले गीत

मधुर गाना तुम.

रवि नव -

सम्वतसर के

स्वस्ति लिए आना तुम.


हरे पात -

फूलों में

चिड़ियों की चहक रहे,

वातायन

आँगन में

केसर की महक रहे,

आँखों में

भर देना

स्वप्न हर सुहाना तुम.


भारत माँ

गंगा की

धारा हो पावनी,

कत्थक हो

कुचीपुड़ी

और कहीं लावनी,

जम्मू, केरल

इम्फल,

गोवा को भाना तुम..


सारे मौसम

महकें

ऋतुओं का गान रहे,

साँझ ढले

पथ -चौरा,गेह 

दीप्तिमान रहे,

सूर्यमुखी

खेतों से

आँख भी मिलाना तुम.

कवि -

जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 


Thursday, 20 October 2022

एक गीत -दीवाली पर दीप जलाता मेरा हिंदुस्तान

चित्र साभार गूगल माननीय योगी जी और माननीय प्रधानमंत्री जी 


चित्र साभार गूगल 

समस्त देशवासियों एवं प्रवासी भाइयों को प्रकाश पर्व दीपावली की बधाई और हार्दिक शुभकामनायें 

एक गीत -दीवाली पर दीप जलाता मेरा हिंदुस्तान


दीवाली पर दीप जलाता

मेरा हिंदुस्तान.

सबके दिल में रंग सजाता

मेरा हिंदुस्तान.


भाषा, बोली, और विविधता

सारे रंग समाये हैँ,

मेल -जोल के गीत यहाँ तो

बंजारे भी गाये हैँ,

जो भी इस रंग में शामिल है

उन सबका सम्मान.


ओ माटी के दीपक जलना

खेत और खलिहानों में,

घर -आँगन में उजियारा हो

उजियारा बगानों में,

जब -जब दीप जलेगा टूटेगा

तम का अभिमान.


विश्व गुरु हो भारत

जल -थल -नभ में हो खुशहाली,

पशु -पंछी सबके होठों पर

हो अमृत की प्याली,

मरुथल में भी बादल बरसे

रहे न नखलिस्तान.


सत्य सनातन, संस्कृति अपनी

इसका रंग निराला,

मंत्र, हवन, फुलझड़ियों के संग-

गेंदा, गुड़हल,माला,

हवा साथ में लिए घूमती है

चंदन, लोबान.


कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


एक लोकभाषा गीत -दीपावली

चित्र साभार गूगल 

मित्रों आप सभी को प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

गीत पुराना है 


एक लोकभाषा गीत -देश में अब हमेशा अजोरिया रहै 


ई चनरमा रहै ,

ना अन्हरिया रहै |

देश में हमरे 

हर दिन अजोरिया रहै |


सबके घर से अँधेरा 

मिटावै के बा ,

सबके देहरी रंगोली 

सजावै के बा ,

धूप खुलि के हंसै

ना बदरिया रहै |


झील में फूल सुन्दर 

कँवल कै खिलै ,

सब ठठाके हंसै

जब केहू से मिलै

हर सुहागन क 

चुनरी लहरिया रहै |


वीर सीमा प देशवा 

क रक्षा करैं ,

गाँव कै लोग खेती से 

अन -धन भरैं ,

गुड़ खियावत अतिथि के 

ओसरिया रहै |


पर्व -उत्सव से नाता 

न टूटै कभी ,

हाथ पकड़ीं त 

फिर -फिर न छूटै कभी ,

ई दीवाली रहै 

ई झलरिया रहै |

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 



Saturday, 20 August 2022

एक गीत -हज़ारों फूल खिलते थे

चित्र साभार गूगल 


एक गीत -हजारों फूल खिलते थे


कोई भी

मूड,मौसम हो

मग़र हम साथ चलते थे.

यही वो रास्ते

जिन पर

हज़ारों फूल खिलते थे.


कहाँ संकोच से

नज़रें मिलाना

मुस्कुराना है,

कहाँ अब 

रूठने वाला कोई

किसको मनाना है,

यही मन्दिर था

जिसमें प्यार के

भी दिए जलते थे.


कहाँ अब

इत्र,खुशबू

तितलियों सा दिन सुहाना है,

कहाँ चेहरा

बदलकर

आईने का दिल लुभाना है,

यही ऑंखें थीं

जिनमें नींद

भी थी,ख़्वाब पलते थे.


कहाँ बज़रे पे

अब मौसम

कोई भी गीत सुनता है,

तुम्हारी

उँगलियों से

वक़्त अब स्वेटर न बुनता है,

कभी वो

चाँदनी,हम

रात तारों से निकलते थे

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Monday, 8 August 2022

एक देशगान -तीन रंग से सजा तिरंगा



एक देशगान -तीन रंग से सजा तिरंगा


तीन रंग से

सजा तिरंगा

हर घर में लहराए.

आज़ादी का

चन्दन वन यह

कभी नहीं मुरझाए.


जल थल नभ में

रहे प्रतिष्ठित

अपनी भारत माता,

शोषित, वंचित

दीन जनों का

भारत भाग्य विधाता,

राष्ट्रगान को

वेद मंत्र सा

सारी दुनिया गाए.


लाल चौक

पी. ओ. के. दिल से

वन्देमातरम बोले,

श्वेत कबूतर

केसर की

क्यारी में डैने खोले,

भारत की

हर बोली भाषा

सबके मन को भाए.


ज्ञान, कला, विज्ञान

संस्कृति

सबकी धारा हो,

यह बलिदानी

देश यहाँ

हर मौसम प्यारा हो,

अमृत महोत्सव

आज़ादी का

घर घर पर्व मनाए.


आज़ादी के लिए

मरे जो

वो शहीद, बलिदानी,

रामकथा सी

हर घर गूंजे

उनकी शौर्य कहानी,

इस मिट्टी का

बच्चा बच्चा

उनपर फूल चढ़ाए.


गंगा -जमुना

निर्मल रखना

निर्मल रहे हिमालय,

गिरिजाघर,

गुरुद्वारा, मस्जिद

सजा रहे देवालय,

सत्य अहिंसा

समरसता का

शिक्षक पाठ पढ़ाए.

कवि जयकृष्ण राय तुषार



Sunday, 31 July 2022

एक ग़ज़ल -राम को जब कोई हैवान भुला देता है


प्रभु श्रीराम 


एक ग़ज़ल --कोई मौसम कहाँ सूरज को बुझा देता है

शांत मौसम में हरा पेड़ गिरा देता है
ये वही जाने किसे, कौन सज़ा देता है

सब उजाले में शहँशाह समझते खुद को
रात में नींद में इक ख़्वाब डरा देता है

उसका घर वैसा ही है जैसा बना है मेरा
आदतन फिर भी वो शोलों को हवा देता है

बुझ गए जब भी दिए दोष हवाओं का रहा
कोई मौसम कहाँ सूरज को बुझा देता है

स्वर्ण की जलती हुई लंका ही मिलती है उसे
राम को जब कोई हैवान भुला देता है 

कवि -शायर जयकृष्ण राय तुषार 


Thursday, 28 July 2022

ग़ज़ल -इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -इस बनारस का हरेक रंग


इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी

सुबहे काशी भी है, गंगा भी, शिवाला है अभी


जिन्दगी पाँव का घूँघरू है ये टूटे न कभी

कोई महफ़िल में तुझे चाहने वाला है अभी


तेज बारिश है, घटाएँ भी हैं, सूरज भी नहीं

किसकी तस्वीर से कमरे में उजाला है अभी


डर की क्या बात चलो आओ सफ़र में निकलें

धूप के साथ नदी, वन में गज़ाला है अभी


कल इसी गोले को ये दुनिया कहेगी सूरज

शाम को झील में जो डूबने वाला है अभी


आरती करते हुए कौन है पारियों की तरह

मैं ग़ज़ल कह दूँ मगर हाथ में माला है अभी


चलके धरती से गगन देखना नीला होगा

चाँद की छत से नहीं देखना काला है अभी


भूख की बात मैं कविता में लिखूँ तो कैसे

मेरे हाथों में गरम चाय का प्याला है अभी

कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Tuesday, 26 July 2022

एक ग़ज़ल -मौसम का कुछ असर ही नहीं




एक ग़ज़ल -ख़ुशी से हाथ मिलाता कोई बशर ही नहीँ

नए ज़माने पे मौसम का कुछ असर ही नहीं
सुना है फूल, परिंदो का ये नगर ही नहीं

नुकीले काँटों के चुभने का दर्द मुझको पता
वो नंगे पाँव किया था कभी सफ़र ही नहीं

मेरे ख़तों का न आया कोई जवाब उनका 
सुना है उनपे मोहब्बत का कुछ असर ही नहीं

छतों पे चाँदनी आकर गगन में लौट गयी
मैं अपनी क़ैद में बैठा मुझे ख़बर ही नहीं

तुम्हारे लाँन में गमले हजार रंग के हैं
मगर परिंदो के लायक कोई शज़र ही नहीं 

हरेक मोड़ पे पूजा, नमाज़ के झगड़े
ख़ुशी से हाथ मिलाता कोई बशर ही नहीं

हमारे संतों ने दुनिया को ज्ञान ज्योति दिया
तमाम वेद,गणित में महज सिफ़र ही नहीं

शायर /कवि जयकृष्ण राय तुषार


चित्र साभार गूगल 


Monday, 25 July 2022

एक देशगान -पीठ शारदा पी. ओ. के. में

शक्तिपीठ शारदा की पाकिस्तान में दुर्दशा 


भारत की प्राचीन विद्या का महान केंद्र और शक्ति पीठ माँ शारदा का मंदिर पी. ओ. के. में आज यह शक्ति पीठ खंडहर में तब्दील हो गया है. भगवान महकाल अमरनाथ की गुफा में कश्मीर में माँ शारदा पीठ की मुक्ति मोदी जी और भारत के महान सैनिक कर सकते हैं. वन्देमातरम


एक गीत -पीठ शारदा पी. ओ. के. में


पीठ शारदा

पी. ओ. के. में

अमरनाथ कश्मीर में.

जिन्ना, नेहरू

किसने लिक्खा

भारत की तक़दीर में.


मातृभूमि को

खंडित करने का

अंदाज अनोखा था,

सन 47 का

बँटवारा 

भारत माँ से धोखा था,

यह कैसी

आज़ादी जिसमें

हाथ -पाँव जंज़ीर में.


पंचशील के

गद्दारों को

तगड़ा सबक सिखाना है,

बीजिंग के

सीने पर चढ़कर

वन्देमातरम गाना है,

फिर से

बिजली चमके

पोरस के तरकश, शमशीर में.


दुष्ट पडोसी

आतंकी है

हर दिन है शैतानी में,

अग्नि बाण से

ज्वालामुखियाँ

भर झेलम के पानी में,

प्रलय करे

ऐसी जलधारा

हो गंगा के नीर में.


अबकी रहे

तिरंगा घर -घर

देशगान की शाम हो,

उसको भय क्यों

जिसके घर में

विश्व विजेता राम हो,

कोई फिर से

प्राण फूँक दे

सोए गोगा वीर में.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

भारतीय वायुसेना 


Sunday, 24 July 2022

एक गीत -अब देवास कहाँ सुनता है निर्गुण गीत नईम के


चित्र साभार गूगल 


एक गीत -अब देवास कहाँ सुनता है निर्गुण गीत नईम के 


कोयल चैत न 

सावन कजली

झूले गायब नीम के.

परदेसी हो

गए पुरोहित

काढ़े नहीँ हक़ीम के.


ऐसे मौसम में

मन कैसे

गोकुल या बरसाना हो,

विद्यापति को

कौन सूने

जब यो यो वाला गाना हो,

तुलसी, कबिरा

भूल गए

अब दोहे कहाँ रहीम के.


कला, संस्कृति

अपनी भूली

अंग्रेजी मुँह चाट रही,

सोफ़े पसरे

दालानों में

धूप में झिलँगा खाट रही,

कहाँ कबड्डी

गिल्ली डंडा

कहाँ अखाड़े भीम के.


पत्तल, दोने

रंग न उत्सव

नदी में लटकी डाल कहाँ,

आल्हा, बिरहा

नाच धोबिया

नौटंकी, करताल कहाँ,

बिखर गए हैं

कलाकार सब

बंजारों की टीम के.


लोकरंग में

डूबी संध्या

कहाँ पहाड़ी राग है

फूलों की 

घाटी में  हर दिन 

बादल फटते,आग है,

अब देवास

कहाँ सुनता है

निर्गुण गीत नईम के.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार



सभी चित्र साभार गूगल

कवि गीतकार नईम 

नए वर्ष का गीत -स्वस्ति लिए आना तुम

चित्र साभार गूगल  नववर्ष का मंगल गीत -स्वस्ति लिए आना तुम होठों पर वंशी ले गीत मधुर गाना तुम. रवि नव - सम्वतसर के स्वस्ति लिए आना तुम. हरे प...