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Thursday, 7 April 2016

एक गीत -माँ भी तो गंगा सी बहती है



चित्र /पेंटिग्स गूगल से साभार 


एक गीत -माँ भी तो गंगा सी बहती है 

रिश्तों का 
दंश 
रोज सहती है |
माँ भी 
तो गंगा -
सी बहती है |

मौसम 
से भी 
पहले बदली है,
निर्गुण है 
सोहर है 
कजली है ,
दुविधा में 
कभी 
नहीं रहती है |

भोलापन 
उसकी 
कमजोरी है ,
लोककथा 
बच्चों की 
लोरी है ,
गीता है 
माँ !
सच ही कहती है |

सब अपने 
ही
उसको छलते हैं ,
थके हुए
पांव
मगर चलते हैं ,
अपना दुःख 
कब 
किससे कहती है |


एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

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