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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -
इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी
इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी
सुबहे काशी भी है, गंगा भी, शिवाला है अभी
जिन्दगी पाँव का घूँघरू है ये टूटे न कभी
कोई महफ़िल में तुझे चाहने वाला है अभी
तेज बारिश है, घटाएँ भी हैं, सूरज भी नहीं
किसकी तस्वीर से कमरे में उजाला है अभी
डर की क्या बात चलो आओ सफ़र में निकलें
धूप के साथ नदी, वन में गज़ाला है अभी
कल इसी गोले को ये दुनिया कहेगी सूरज
शाम को झील में जो डूबने वाला है अभी
आरती करते हुए कौन है पारियों की तरह
मैं ग़ज़ल कह दूँ मगर हाथ में माला है अभी
चलके धरती से गगन देखना नीला होगा
चाँद की छत से नहीं देखना काला है अभी
भूख की बात मैं कविता में लिखूँ तो कैसे
मेरे हाथों में गरम चाय का प्याला है अभी
कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार
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