Wednesday, 23 October 2019

एक गीत-बापू ! रहे हिमालय


एक गीत -बापू ! रहे हिमालय
बापू रहे
हिमालय ,उनका
दर्शन गोमुख धारा है ।
यह जलती
मशाल जैसा है
जहाँ-जहाँ अँधियारा है ।

रंगभेद के
प्रबल विरोधी
गिरमिटिया कहलाते थे,
चरखा-खादी
लिए साथ में
रघुपति राघव गाते थे,
सत्य अहिंसा
मन्त्र उन्ही का
मानवता का नारा है ।

छुआछूत
अभिशाप बताते
रहे स्वदेशी को अपनाते,
हिन्दू-मुस्लिम
सिक्ख-ईसाई
सादर सबको गले लगाते,
आज़ादी के
अनगिन तारों में
गाँधी ध्रुवतारा है ।

लड़े गुलामी
और दासता की
अभेद्य प्राचीरों से,
एक लुकाठी
लड़ी हजारों
बन्दूकों-शमशीरों से,
चम्पारण
दांडी का नायक
विजयी था,कब हारा है?

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

एक ग़ज़ल -मुझको बदलते दौर की वो हीर चाहिए

चित्र साभार गूगल  एक ग़ज़ल -हिन्दी ग़ज़ल को भी तो कोई मीर चाहिए अपनी ज़मीन पर नई तामीर चाहिए शेर-ओ- सुखन को इक नई तस्वीर चाहिए महफ़िल में अब भी सु...