Showing posts with label एक प्रेमगीत. Show all posts
Showing posts with label एक प्रेमगीत. Show all posts

Monday, 8 February 2021

एक प्रेमगीत-झुकी नज़रें गुलमोहर ,मुस्कान वाले दिन

 

चित्र-साभार गूगल

एक प्रेमगीत-

चिट्ठियाँ पढ़ते हुए सुनसान वाले दिन


झुकीं नज़रें

गुलमोहर

मुस्कान वाले दिन ।

याद हैं

अब भी 

मुलेठी पान वाले दिन।


पुस्तकों के

बीच में

तस्वीर रखकर देखना,

राह चलते

आदमी पर

एक कंकड़ फेंकना,

चिट्ठियाँ

पढ़ते हुए

सुनसान वाले दिन ।


आईने को

देखकर

हँसना स्वगत रोना,

मेज पर ही

सिर टिकाकर

देर तक सोना,

याद हैं

सहगल,रफ़ी

अनजान वाले दिन ।


टूटते तारे

हवा में

चाँदनी रातें,

बिना बोले

खिड़कियाँ

करती रहीं बातें,

माँ की

चिन्ताएं, नज़र

लोबान वाले दिन ।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Monday, 3 October 2011

एक प्रेम गीत -बीत गया दिन मौसम को पढ़ते

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
बीत गया दिन मौसम को पढ़ते -एक गीत 
खुली किताबें 
बीत गया दिन 
मौसम को पढ़ते |
अनगढ़ 
चट्टानों में बैठे 
तुमको हम गढ़ते |

कभी अजंता 
कभी एलोरा 
खजुराहो आये ,
लेकिन तेरा 
रम्य रूप हम 
कहीं नहीं पाये ,

शीशे मिले 
खरोचों वाले 
कहाँ तुम्हें मढ़ते |

कहीं महकते 
फूल कहीं पर 
उगे कास ,बढ़नी ,
हिरन न भटके 
पीछे मुड़कर 
देख रही हिरनी ,

प्यास देखती 
रही झील को 
पर्वत पर चढ़ते |

हरी घास पर 
बैठी चिड़िया 
खुजलाती पाँखें ,
सतरंगी 
सपनों में उलझी 
दो  जोड़ी ऑंखें ,

इच्छाओं के 
रूमालों पर 
फूलों सा कढ़ते |

बंजारन का 
बोझ न उतरे 
सपने अभी कुंवारे ,
मन के जंगल 
हमीं अकेले 
किसको करे इशारे ,

हाथ थामकर 
संग -संग उसके 
हम आगे बढ़ते |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Saturday, 23 July 2011

प्रेम गीत -यही रंग है

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
यही रंग है -एक प्रेम गीत 

यही रंग है 
जो मिलता है 
कालिदास की उपमाओं में |
यही रूप है 
जिसे ढूंढता हर कवि 
अपनी कविताओं में |

फूल  सुवासित 
होते इससे मौसम 
अपना रंग बदलते ,
इसे देखकर 
जल लहराता अनगिन 
सीपी, शंख निकलते ,
लहरों के संग 
सोनमछलियाँ उठतीं -
गिरतीं सरिताओं में |

नीलगगन में 
इन्द्रधनुष के रंग 
इसी से आये होंगे ,
लोकरंग में 
रंगकर कजली 
कितने सावन गाये होंगे ,
यही हाथ में 
हाथ थामकर 
चलता घोर निराशाओं में |

यही रंग है 
जिसे उर्वशी और 
मेनका ने था पाया ,
यही रंग है 
जिसे जायसी ,ग़ालिब 
मीर सभी ने गाया ,
बिना अनूदित 
सब पढ़ लेते इसको 
अनगिन भाषाओँ में |

इसी रंग में 
रंगकर कितने राँझे 
कितने हीर हो गए ,
इसकी लौ में 
जलकर कितने 
पंडित और फकीर हो गए ,
कई बार हम 
इसी रंग के कारण 
पड़ते दुविधाओं में |
चित्र -गूगल से साभार 
[इन चित्रों से ही इस गीत का सृजन हुआ ]

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी हँसकर  ज़िन्दगी का   गाती  है. धूप -छाँही  सफऱ में ...