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| चित्र-साभार गूगल |
एक प्रेमगीत-
चिट्ठियाँ पढ़ते हुए सुनसान वाले दिन
झुकीं नज़रें
गुलमोहर
मुस्कान वाले दिन ।
याद हैं
अब भी
मुलेठी पान वाले दिन।
पुस्तकों के
बीच में
तस्वीर रखकर देखना,
राह चलते
आदमी पर
एक कंकड़ फेंकना,
चिट्ठियाँ
पढ़ते हुए
सुनसान वाले दिन ।
आईने को
देखकर
हँसना स्वगत रोना,
मेज पर ही
सिर टिकाकर
देर तक सोना,
याद हैं
सहगल,रफ़ी
अनजान वाले दिन ।
टूटते तारे
हवा में
चाँदनी रातें,
बिना बोले
खिड़कियाँ
करती रहीं बातें,
माँ की
चिन्ताएं, नज़र
लोबान वाले दिन ।
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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