Thursday, 30 December 2010

नये साल की उफ! कितनी तस्वीर घिनौनी है।

चित्र -गूगल से साभार 
एक नवगीत -नये साल की उफ़ !कितनी तस्वीर घिनौनी है 
नये साल की उफ़ !
उफ!  कितनी
तस्वीर घिनौनी है।
फिर
अफवाहों से ही
अपनी आंख मिचौनी है।


वही सभी
शतरंज खिलाड़ी
वही पियादे हैं,
यहां हलफनामों में भी
सब झूठे वादे हैं,
अपनी मूरत से
मुखिया की
मूरत बौनी है।


आंगन में
बंटकर तुलसी का
बिरवा मुरझाया,
मझली भाभी का
दरपन सा
चेहरा धुंधलाया,
मछली सी
आंखों में
टूटी एक बरौनी है।


गेहूं की
बाली पर बैठा
सुआ अकेला है,
कहासुनी की
मुद्राएं हैं
दिन सौतेला है,
दिन भर बजती
दरवाजे की
सांकल मौनी है।

चित्र से  गुगल सर्च से साभार

Monday, 27 December 2010

एक गीत -स्वागत आगन्तुक दिनमान का

चित्र -गूगल से साभार 
कल का सूरज
डूबा, स्वागत!
आगन्तुक दिनमान का।
यह सम्वत
शायद कुछ बदले
चेहरा रेगिस्तान का।

बहुत
बदलना चाहे लेकिन
मौसम नहीं बदलता है,
हरियाली का
स्वप्न आंख में
धू-धू करके जलता है,
चैमासे में
खेत पड़ा है
मुंह पीला खलिहान का।

हंसे कुंवारी
धूप हल्दिया
मैना आंगन चहके,
अरुणिम
आभा से पलाश की
जंगल घाटी दहके,
आछी के
फूलों सा महके
हर कोना दालान का।

सिर पर
ओढ़े रात चांदनी
लहरिल मोती झील हो,
चहल पहल में
मन का गहरा
सन्नाटा तब्दील हो,
जूड़े-जूड़े
फूल टांकता
हाथ बढ़े पवमान का।

पल्लव
अधरों से फिर ऋतुएं
छन्द पढ़ें अमराई के,
हर उत्सव में
पंडवानी के गीत
हों तीजन बाई के,
स्वागत करें
सुआ पिंजरे से
घर आये मेहमान का।

Sunday, 5 December 2010

बड़की भौजी - कवि कैलाश गौतम

 कवि कैलाश गौतम
कैलाश गौतम हिन्दी के अप्रतिम कवि हैं। गीत, कविता, दोहे, व्यंग्य कोई भी विषय उनकी कलम के लिए अपरिचित नहीं है। काव्यमंचों पर श्रोताओं के मन को झकझोरने वाले इस कवि की रचनाओं में विविधता देखने को मिलती है। कैलाश जी के बारे में सुप्रसिद्ध गीतकवि यश मालवीय कहते हैं - ‘‘कैलाश गौतम रिश्तों की छुवन और सम्बन्धों की मिठास के अप्रतिम कवि हैं। उनकी कविता ‘बड़की भौजी’ भारतीय जनमानस में पैठी पूजा-प्रार्थना जैसी एक ऐसी स्त्री है जो घर-परिवार को दिये की लौ की तरह प्रतिक्षण सहेजती रहती है। आत्मीयता का आलोक कदम-कदम पर अभिव्यंजित करने वाले कैलाश जी शायद इसीलिए अपने समकालीनों के बीच एकदम अलग खड़े किनारे के पेड़ जैसे नजर आते हैं।’’

09 दिसम्बर कैलाश गौतम की चैथी पुण्यतिथि है। इस अवसर पर हम उनकी लोकप्रिय रचना ‘बड़की भौजी’ अपने पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं -

 बड़की भौजी- कवि कैलाश गौतम

जब देखो तब बड़की भौजी हंसती रहती है
हंसती रहती है कामों में फंसती रहती है
झर-झर झर झर हंसी होठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है।।

डोरा देह कटोरा आंखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है
खुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गये तक भौजी घर में खटती है।।

कभी न करती नखरा तिल्ला सादा रहती है
जैसे बहती नाव नदी में वैसे बहती है
सबका मन रखती है घर में सबको जीती है
गम खाती है बड़की भौजी गुस्सा पीती है।।

चौका चूल्हा खेत कियारी सानी पानी में
आगे-आगे रहती है कल की अगवानी में
पीढ़ा देती पानी देती थाली देती है
निकल गयी आगे से बिल्ली गाली देती है।।

भौजी दोनों हाथ दौड़कर काम पकड़ती है
दूध पकड़ती दवा पकड़ती दाम पकड़ती है
इधर भागती उधर भागती नाचा करती है
बड़की भौजी सबका चेहरा बांचा करती है।।

फुर्सत में जब रहती है खुलकर बतियाती है
अदरक वाली चाय पिलाती पान खिलाती है
भइया बदल गये पर भौजी बदली नहीं कभी
सास के आगे उलटे पल्ला निकली नहीं कभी।।

हारी नहीं कभी मौसम से सटकर चलने में
गीत बदलने में है आगे राग बदलने में
मुंह पर छींटा मार मार कर ननद जगाती है
कौआ को ननदोई कहती हंसी उड़ाती है।।

बुद्धू को बेमशरफ कहती भौजी फागुन में
छोटी को कहती है गरी चिरौंजी फागुन में
छठे समासे गंगा जाती पुण्य कमाती है
इनकी उनकी सबकी डुबकी स्वयं लगाती है।।

आंगन की तुलसी को भौजी दूध चढ़ाती है
घर में कोई सौत न आये यही मनाती है
भइया की बातों में भौजी इतना फूल गयी
दाल परसकर बैठी रोटी देना भूल गयी।।
चित्र से picasaweb.google.com साभार

Tuesday, 9 November 2010

स्मृति-शेष पिता को याद करते हुए

स्व0 रुद्र प्रताप राय
15 अगस्त 1936 - 31 अक्टूबर 2010

मित्रों ज्योति पर्व दीपावली के ठीक पांच दिन पूर्व मुझे गहरा सदमा लगा। मेरी पत्नी मंजुला राय के सिर से पिता का साया और मेरे सिर से पिता तुल्य श्वसुर का साया उठ गया। पिता जी 31 अक्टूबर 2010 को हम सबसे विदा ले लिए। सामने दीपावली का पर्व था अतः मैं आप सबको दुखी नहीं करना चाह रहा था क्योंकि मेरा एक शेर है - किसी लमहा अगर कोई हमें खुशहाल लगता है। मैं अपने गम और उसके बीच में दीवार करता हूं। मैंने भी आप सबकी खुशी और अपने गम केबीच में एक दीवार खड़ी कर दिया। पिता की यादें ही अब हमारे पास धरोहर हैं। पिता रुद्रप्रताप राय का जनम 15 अगस्त 1936 को जनपद जौनपुर में हुआ था। लोगों के बीच में रुदल बाबू के नाम से लोकप्रिय थे। एक सहृदय इन्सान, एक ख्यातिलब्ध अधिवक्ता को हमने खो दिया। पिता रुद्रप्रताप राय उस जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा हासिल की थी। पत्नी पद्मा राय बेटियां अनुराधाराय, मृदुला राय, मंजुला राय बेटे अतुल कुमार राय, अजय राय बहू माया राय, नीलम राय प्रपौत्र अंकित राय, आयुष और यश की ओर से तथा मैं अपनी ओर से पिता को एक काव्यात्मक श्रद्धांजलि दे रहा हूं। यह गीत उन सबके पिता को समर्पित है जो अब स्मृति शेष हैं -

स्मृति शेष  पिता को याद करते हुए 

पिता!
घर की खिड़कियों
दालान में रहना।
यज्ञ की 
आहुति, कथा के
पान में रहना।

जब कभी
माँ को
तुम्हारी याद आयेगी,
अर्घ्य 
देगी तुम्हें
तुम पर जल चढ़ायेगी,
और तुम भी
देवता
भगवान में रहना।

अब नहीं
आराम कुर्सी,
बस कथाओं में रहोगे,
प्यार से
छूकर हमारा मन
समीरन में बहोगे,
फूल की
इन खुशबुओं में
लॉन  में रहना।

माँ!
हुई जोगन
तुम्हारा चित्र मढ़ती है,
भागवत 
के पृष्ठ सा 
वह तुम्हें पढ़ती है ,
स्वर्ग में
तुम भी 
उसी के ध्यान में रहना |

चाँद-तारों से 
निकलकर
कभी तो आना, 
हम अगर
भटकें, हमें फिर
राह दिखलाना,
सात सुर में
बांसुरी की
तान में रहना।

पिता!
हमने गलतियां की हैं
क्षमा करना,
हमें दे
आशीष
घर धन-धान्य से भरना,
तुम
हमारे गीत में
ईमान में रहना।

चित्र  avdevantimes.blogspot.com से साभार


Tuesday, 26 October 2010

दो रचनाएं : सन्दर्भ - करवा चौथ


जयकृष्ण राय तुषार 
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के सम्मुख
एक
आज करवा चौथ का दिन है

आज करवा चौथ
का दिन है
आज हम तुमको संवारेंगे।
देख लेना
तुम गगन का चांद
मगर हम तुमको निहारेंगे।

पहनकर
कांजीवरम का सिल्क
हाथ में मेंहदी रचा लेना,
अप्सराओं की
तरह ये रूप
आज फुरसत में सजा लेना,
धूल में
लिपटे हुए ये पांव
आज नदियों में पखारेंगे।

हम तुम्हारा
साथ देंगे उम्रभर
हमें भी मझधार में मत छोड़ना,
आज चलनी में
कनखियों देखना
और फिर ये व्रत अनोखा तोड़ना ,
है भले
पूजा तुम्हारी ये
आरती हम भी उतारेंगे।

ये सुहागिन
औरतों का व्रत
निर्जला, पति की उमर की कामना
थाल पूजा की
सजा कर कर रहीं
पार्वती शिव की सघन आराधना,
आज इनके
पुण्य के फल से
हम मृत्यु से भी नहीं हारेंगे।

दो 
जमीं के चांद को जब चांद का दीदार होता है

कभी सूरत कभी सीरत से हमको प्यार होता है
इबादत में मोहब्बत का ही इक विस्तार होता है

तुम्हीं को देखने से चांद करवा चौथ होता है
तुम्हारी इक झलक से ईद का त्यौहार होता है

हम करवा चौथ के व्रत को मुकम्मल मान लेते हैं
जमीं के चांद को जब चांद का दीदार होता है

निराजल रह के जब पति की उमर की ये दुआ मांगें
सुहागन औरतों का स्वप्न तब साकार होता है

यही वो चांद है बच्चे जिसे मामा कहा करते
हकीकत में मगर रिश्तों का भी आधार होता है

शहर के लोग उठते हैं अलार्मों की आवाजों पर
हमारे गांव में हर रोज ही जतसार होता है

हमारे गांव में कामों से कब फुरसत हमें मिलती
कभी हालीडे शहरों में कभी इतवार होता है।
चित्र -गूगल से साभार 

चित्र  ganeshaspeaks.com 

Sunday, 26 September 2010

सच के बारे में


 शैलेन्द्र
कवि एवं प्रभारी, जनसत्ता कोलकाता संस्करण
हिन्दी कविता में शैलेन्द्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हिन्दी पत्रकारिता के पेशे से लम्बे समय से जुड़े शैलेन्द्र इस समय जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रभारी हैं। शैलेन्द्र जितने उत्कृष्ट कवि और पत्रकार हैं उतने ही सहज इंसान भी हैं। ५ अक्टूबर १९५६ को बलिया के मनियार नाम के कस्बे में शैलेन्द्र का जन्म हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर इस कवि की रचनाएं देश की समस्त प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। हम उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक ''अपने ही देश में'' से एक कविता अपने पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं।

पता- २ किशोर पल्ली, बेलघरिया
कोलकाता - ७०००५६



सच के बारे में

आओ
थोड़ा छत पर टहल लें
मकान मालिक के
लौटने तक
चांदनी तले
थोडा हंस-खिलखिला लें
तारों की ओर नजर कर लें

कितना अच्छा लगता है
तुम्हारे हाथ में हाथ डालकर
थिरकता खुले आसमान के नीचे
अभी पड़ोस की इमारतें
ऊंचा उठने ही वाली है
और उस तरफ
बस रही बस्ती
ऊफ!


हर तरफ उठ रही हैं लाठियां
कमजोर जिस्मों को तलाशती
आओ
थोड़ा और करीब आओ
कदम-कदम पर हारते
सच के बारे में
थोडा बतिया लें।

Wednesday, 22 September 2010

हम तो मिट्‌टी के खिलौने थे गरीबों में रहे


कोई पूजा में रहे कोई अजानों में रहे
हर कोई अपने इबादत के ठिकानों में रहे

अब फिजाओं में न दहशत हो, न चीखें, न लहू
अम्न का जलता दिया सबके मकानों में रहे

ऐ मेरे मुल्क मेरा ईमां बचाये रखना
कोई अफवाह की आवाज न कानों में रहे

मेरे अशआर मेरे मुल्क की पहचान बनें
कोई रहमान मेरे कौमी तरानें में रहे

बाज के पंजों न ही जाल, बहेलियों से डरे
ये परिन्दे तो हमेशा ही उड़ानों में रहे

हम तो मिट्‌टी के खिलौने थे गरीबों में रहे
चाभियों वाले बहुत ऊंचे घरानों में रहे

वो तो इक शेर था जंगल से खुले में आया
ये शिकारी तो हमेशा ही मचानों में रहे।

चित्र photos.merinews.com से साभार

Monday, 20 September 2010

एक कविता -कचहरी कवि -कैलाश गौतम



कवि -कैलाश गौतम
(०८-०१-१९४४ से ०९ दिसम्बर २००६)

काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का ९ दिसम्बर २००६ को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। ८ जनवरी १९४४ को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड ी, बिना कान का आदमी (प्रकाशनाधीन) आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि ५.०० लाख रुपये) से इस कवि को सम्मानित किया। अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम की कविता ''कचहरी'' हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय / राष्ट्रीय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं-


कचहरी


भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे तैसे गिरस्ती चलाना
भले जाके जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना कचहरी न जाना॥




कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी मेरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है॥


कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहां पैरवी अब दलाली है बेटे॥


कचहरी ही गुन्डों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुलेआम कातिल यहां घूमते है
सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं॥


कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहां झूठ की ही कमाई है बेटे
यहां झूठ का रेट हाई है बेटे॥


कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मरा जी रहा है गवाही में ऐसे
हैं तावें का हण्डा सुराही में जैसे॥


लगाते बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहां से खुलेगा बटन देखती है॥


कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाजिर नहीं है
है बासी मुंह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिनभर रुलाती कचहरी॥


मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है॥


मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों ने घेरा सुझाया बुझाया
वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया॥


धनुष हो गया हूं मैं टूटा नहीं हूं
मैं मुट्‌ठी हूं केवल अंगूठा नहीं हूं
नहीं कर सका मैं मुकदमे का सौदा
जहां था करौंदा वहीं है करौंदा॥


कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हें लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना॥


कभी भूलकर भी न आंखें उठाना
न आंखें उठाना न गर्दन फंसाना
जहां पाण्डवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी॥

Saturday, 11 September 2010

मेरी दो ग़ज़लें

एक 
मैं सूफ़ी हूँ दिलों के दरमियाँ ही प्यार करता हूँ
मैं जिस्मानी मुह्ब्बत में कहाँ ऐतबार करता हूँ


कँटीली झाड़ियों के फूल हाथों से नहीं छूते
मैं शीशे के दरीचों से तेरा दीदार करता हूँ


खुली ज़ुल्फ़ों झुकी नज़रों को जब भी देखता हूँ मैं
ग़ज़ल के आईने में बस तेरा श्रंगार करता हूँ


किसी लम्हा अगर कोई मुझे खुशहाल लगता है
मैं अपने ग़म और उसके बीच में दीवार करता हूँ


मैं एक बादल का टुकड़ा हूँ बरसता हूँ जमीनों पर
तपिश में सूखते पेड़ो को सायादार करता हूँ


ऐ मँहगाई खिलौनों के लिये आना पड़ा मुझको
मैं वरना ईद और होली में बाज़ार करता हूँ


सियासत गिरगिटानों की तरह रंगत बदलती है
मैं इक शायर जो कहता हूँ कहाँ इंकार करता हूँ


दो 


हरेक बागे अदब में बहार है हिन्दी
कहीं गुलाब कहीं हरसिंगार है हिन्दी


ये रहीम, दादू और रसखान की विरासत है
कबीर सूर और तुलसी का प्यार है हिन्दी


फिजी, गुयाना, मॉरीशस में इसकी खुश्बू है
हजारों मील समन्दर के पार है हिन्दी


महक खुलूस की आती है इसके नग्मों से
किसी हसीन की वीणा का तार है हिन्दी


चित्र hindi.webdunia.com से साभार
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Friday, 3 September 2010

दो प्रेम गीत

चित्र -गूगल से साभार 

एक 
जाने क्या होता
इन प्यार भरी बातों में?
रिश्ते बन जाते हैं
चन्द मुलाकातों में।
मौसम कोई हो
हम अनायास गाते हैं,
बंजारे होठ मधुर
बांसुरी बजाते हैं,
मेंहदी के रंग उभर आते हैं
हाथों में
खुली-खुली आंखों में
स्वप्न सगुन होते हैं,
हम मन के क्षितिजों पर
इन्द्रधनुष बोते हैं,
चन्द्रमा उगाते हम
अंधियारी रातों में।
सुधियों में हम तेरे
भूख प्यास भूले हैं
पतझर में भी जाने
क्यो पलाश फूले हैं
शहनाई गूंज रही
मंडपों कनातों में।




दो 
इस मौसम की
बात न पूछो
लोग हुए बेताल से।
भोर नहायी
हवा लौटती
पुरइन ओढ़े ताल से।
चप्पा चप्पा
सजा धजा है
संवरा निखरा है
जाफरान की
खुश्बू वाला
जूड ा बिखरा है
एक फूल
छू गया अचानक
आज गुलाबी गाल से ।
आंखें दौड
रही रेती में
पागल हिरनी सी,
मुस्कानों की
बात न पूछो
जादूगरनी सी,
मन का योगी
भटक गया है
फिर पूजा की थाल से
सबकी अपनी
अपनी जिद है
शर्तें हैं अपनी,
जितना पास
नदी के आये
प्यास बढ ी उतनी,
एक एक मछली
टकराती जानें
कितने जाल से।

Thursday, 5 August 2010

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन  से साभार 
एक 
सलीका बांस को बजने का जीवन भर नहीं होता।
बिना होठों के वंशी का भी मीठा स्वर नहीं होता॥


ये सावन गर नहीं लिखता हसीं मौसम के अफसाने।
कोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता॥


किचन में मां बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में।
किसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता॥


किसी बच्चे से उसकी मां को वो क्यों छीन लेता है।
अगर वो देवता होता तो फिर पत्थर नहीं होता ॥


परिंदे वो ही जा पाते हैं ऊंचे आसमानों तक।
जिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता॥




चित्र -गूगल से साभार 


दो 
नये घर में पुराने एक दो आले तो रहने दो,
दिया बनकर वहीं से मां हमेशा रोशनी देगी।


ये सूखी घास अपने लान की काटो न तुम भाई,
पिता की याद आयेगी तो ये फिर से नमी देगी।


फरक बेटे  औ बेटी  में है बस महसूस करने का,
वो तुमको रोशनी देगा ये तुमको चांदनी देगी।


ये मां से भी अधिक उजली इसे मलबा न होने दो,
ये गंगा है यही दुनिया को फिर से जिंदगी देगी॥

Wednesday, 14 July 2010

एक गज़ल -कोई भी रंग हो मौसम का वो हंसकर निकलती है।

चित्र -गूगल से साभार 
एक ग़ज़ल -वो अक्सर फूल -परियों की तरह 
वो अक्सर फूल परियों की तरह सजकर निकलती है
मगर आंखों में इक दरिया का जल भरकर निकलती है।

कंटीली झाड़ियां उग आती हैं लोगों के चेहरों पर

खुदा जाने वो कैसे भीड़  से बचकर निकलती है।

जमाने भर से इज्जत की उसे उम्मीद क्या होगी

खुद अपने घर से वो लड़की बहुत डरकर निकलती है।

बदलकर शक्ल हर सूरत उसे रावण ही मिलता है 

लकीरों से अगर सीता कोई बाहर निकलती है  |

सफर में तुम उसे ख़ामोश गुड़िया मत समझ लेना

जमाने को झुकी नजरों  से वो पढ कर निकलती हैं।

खुद जिसकी कोख में ईश्वर भी पलकर जन्म लेता है

वही लड़की  खुद अपनी कोख से मरकर निकलती है।

जो बचपन में घरों की जद हिरण सी लांघ आती थी

वो घर से पूछकर हर रोज अब दफ़्तर  निकलती है।

छुपा लेती है सब आंचल में रंजोग़म  के अफ़साने

कोई भी रंग हो मौसम का वो हंसकर निकलती है।

Saturday, 19 June 2010

एक गीत -लैपटाप में जंगल

एक गीत -लैपटॉप मे जंगल 
फूल खिले बाग हैं
तितलियां हैं
बच्चों की कलम पर
उंगलियां हैं!

पीठ लदे बस्तों में
दिन सारा बीता
लैपटाप में जंगल
देखती सुनीता
शीशे के ताल में
मछलियां हैं!

बात-बात पर छोटू
मम्मी से लड़ता
रिश्तों का मतलब भी
समझाना पड़ता
चश्मे के नम्बर में
कैद ये पुतलियां हैं!

वासन्ती भोर कहां
चंदा की रातें
खत्म हुई लोककथा
परियों की बातें
मोबाइल गेमों की कैद में
पसलियां हैं!

चित्र http://www.istockphoto.com/file_thumbview_approve/1497559/2/istockphoto_1497559-children-laptop.jpg से साभार

Wednesday, 2 June 2010

एक आलेख -हिन्दी नवगीतों में बादल


हिंदी नवगीतों मे बादल -एक आलेख 
ये सूखे बादल
लगते बेहाल से।
मानसून कब लौटेगा
बंगाल से? -जयकृष्ण राय तुषार

आदिम युग से विश्व साहित्य तथा साहित्य की विविध विधाओं में बादलों का विभिन्न रूपों में वर्णन मिलता है। संस्कृत के महान कवि कालिदास का 'मेघदूतम्‌' एक सर्वोत्तम काव्य कृति है। अलाव की तरह तपती हुई धरती पर जब बारिश की अमृतमयी बूंदें छन-छन गिरती हैं तो प्यासी पथराई आंखों में हरियाली के स्वप्न सजने लगते हैं। पेड़ों की शीतल छांह से लौटती हवाओं की आवारगी बढ  जाती है। दूर तक हंसते खिलखिलाते फूलों की मनोहारी छटा देखकर मन रूमानियत से भर उठता है। किशोरियां खुद को आदमकद दर्पण में निहारने लगती हैं और मेंहदी रचे हाथों की चित्रकारी देखकर आसमान में इठलाते इन्द्रधनुष की चमक फीकी पड़  जाती है। चैत-वैशाख में कवियों की लेखनी की सूखी स्याही सदावाहिनी नदियों की तरह तटबन्ध तोड़ने  लगती है। ऐसे में कविता में प्राण फूंकने वाले कवि कैलाश गौतम ननद से भाभी की शरारत बादल के माध्यम से कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं-
बादल टूटे ताल पर
आटा सनी हथेली जैसे
भाभी पोंछ गयी
शोख ननद के गाल पर (जोड़ा ताल से)

हिन्दी के सुप्रसिद्ध गीत कवि माहेश्वर तिवारी भी बादलों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं- 
काले-काले पंख
शिलाओं पर फैलाये 
बादल आये।

आजकल के वरिष्ठ सम्पादक और हिन्दी के खयातिलब्ध गीत कवि श्री योगेन्द्र दत्त शर्मा की सोच इन बादलों के बारे में कुछ इस प्रकार है-
सूर्य बिम्ब
धुंध में धुंधलकों में
खो रहा
मन घिरते मेघों का
शामों को हो रहा (योगेन्द्र दत्त शर्मा)



हिन्दी के सुपरिचित नवगीतकार डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र भी बड़े रूमानी अंदाज में कह उठते हैं -
प्यास हरे 
कोई घन बरसे
तुम बरसो या सावन बरसे

वर्षा में लय, प्रलय, संयोग, वियोग, प्रेम, विछोह सब कुछ समाहित होता है। जिस क्षण जैसा कवि महसूस करता है वैसा ही भाव वह अपने गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। प्रेमशंकर रघुवंशी की सोच कुछ इस तरह है-
पहले मेघ आषाढ  के
बरसेंगे किसके आंगन में
सारी उमस बुहार के

इसी प्रकार गीतकार उमाकांत मालवीय जी जो कुछ दिन तक 'बादल' उपनाम से कतिताएं भी लिखते थे, बड़े ही शास्त्रीय अंदाज में बादल का वर्णन अपने नवगीतों में करते हैं-
बादल जो
शाम से घिरा 
पानी कल रात भर गिरा
पिघल गये मान के उलाहने
घेरा जब कमलतंतु बांह ने
नीले नभ के नयनों में
घन शावक स्वप्न बन तिरा (उमाकान्त मालवीय)

विनोद श्रीवास्तव भी बादलों को कुछ इस तरह से महसूस करते हैं और कह उठते हैं-
बादलों ने कह दिया
आओ चलें घर छोड कर
चाहकर भी हम
निकल पाये न पिंजरे तोड कर

प्रो० विद्यानंदन राजीव बादल में नये अर्थ तलाशते हुए नजर आते हैं और कह उठते हैं-
कितने नये अर्थ देता है
प्यासी धरती को
बादल का आना



बादलों का मानवीकरण गीतकवि विभिन्न रूपों में करते रहे हैं। गीत कविता की आदिम जमीन है। गीत शाश्वत होता है। प्रकृति की प्रत्येक लय में गीत समाहित है और गीतों में प्राकृतिक सुषमा। पारंपरिक गीतों/लोकगीतों में भी बादलों का जीवंत और भरपूर वर्णन मिलता है। हिन्दी के महत्वपूर्ण गीत कवि यश मालवीय को सावन की पहली बरखा आशीष देती हुई नजर आती है-
अभिवादन बादल-बादल
खबर लिए वन उपवन की
कितने आशीर्वाद लिए
पहली बरखा सावन की

मधुकर अष्ठाना तो बादलों के माध्यम से भारतीय राजनीति का विद्रूप चेहरा उजागर करते हैं-
सीख लिया है
मेघों ने भी
लटके झटके बड़े बड़ो के
सींच रहे हैं फुनगी केवल
सगे नहीं हो सके
जड़ो के
बांट दिया है इन्द्रधनुष को
कुछ अगड़ो में
कुछ पिछड़ो में

भोपाल में बैठे गीतकवि मयंक श्रीवास्तव झीलों और तालों के बीच कुछ अलग भाव-भूमि की रचना करते नजर आते हैं-
मेरे गांव घिरे ये बादल
जाने कहां कहां बरसेंगे
अल्हड पन लेकर पछुआ का
घिर आयी निर्दयी हवाएं
दूर-दूर तक फैल गयी है
घाटी की सुरमई जटाएं
ऐसे मदमाते मौसम में
जाने कौन कौन तरसेंगे

डॉ० महाश्वेता चतुर्वेदी बादलों के बीच खुद को यक्षिणी सा महसूस करती हैं।
बादलों मुझ यक्षिणी की बात कहना
नीरगंगा जल बनाकर
मैं तुम्हारे पद पखारूं
चेतना की भव्य प्रतिमा
जानकर तुमको निहारूं



हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष ठाकुर प्रसाद सिंह बादल में पिता की अनुभूति करते हैं-
मां हमारी दूध का तरु
बाप बादल
और बहन हर बोल पर
बजती हुई मादल
उतर आ हंसी
कि मैं वंशी (ठाकुर प्रसाद सिंह)

वरिष्ठ हिन्दी गीत कवि सत्यनारायण बादल को बावरा कहने में तनिक भी संकोच नही करते हैं और कह उठते हैं-
अजब ये बावरे बादल
सलोने सांवरे बादल
कहां से आ गये तिरते
गरजते घुमड़ते घिरते
किसी की ये खुली अलकें
किसी के आंख का काजल (सत्यनारायण)

दिनेश प्रभात बच्चों के स्कूल जाने का बिम्ब बादलों के माध्यम से बड़े  अनोखे अंदाज में प्रस्तुत करते हैं-
काम काज पर लौटे बादल
छुट्‌टी खत्म हुई
नन्ही नन्ही सी बूंदों ने
बस्ते टांग लिए
फिर पापा से गले लिपटकर
पैसे मांग लिए (दिनेश प्रभात)

बृजनाथ श्रीवास्तव की चिंता कुछ इस प्रकार की है। 
मेघ फटे मायानगरी में
जिए गांव ने सूखे
हम कहां-कहां चूके

जहीर कुरेशी घटाओं की तुलना नायिका के जूडे   से करते हैं-
फिर खुले आकाश में जूड़े घटाओं के
फिर हवाओं के दुपट्‌टे हो गये भीने


हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि गुलाब जो अपने आंचलिक गीतों के लिए भी जाने और पहचाने जाते है बादलों की तुलना बंजारों की टोली से करते हैं -
शिखर -शिखर पर 
डोले बादल 


इस पल जमे 
कि उस पल उखड़े 
सुबह बसे 
दुपहर को उजड़े 
बंजारों के टोले बादल 



हिन्दी के कठिन काव्य के कवि चन्द्रसेन विराट भी यहां थोड़ा सरल और सहज दिखते हैं- 
निमंत्रण यह घटाओं का नहीं है आज बेमानी
चलो छत पर बुलाता है प्रथम बरसात का पानी

वरिष्ठ गीत कवि देवेन्द्र शर्मा इन्द्र की सोच कुछ अलग है-
बादल तुम संस्कृत में गरज रहे
क्या न कभी प्राकृत में बरसोगे

इसी प्रकार मुकुट बिहारी सरोज कहते हैं-
आंधी ज्यादा पानी कम है
ये कोई बादल में बादल हैं
यों देखो तो कोई कमी नहीं
लेकिन आचरणों में नमी नहीं

बादल संस्कृत कवियों के परमप्रिय विषय रहे हैं तो छायावादी कवियों के भी प्राणाधार रहे हैं। महाप्राण निराला, पंत, प्रसाद, महादेवी, दिनकर सभी कवियों ने बादल को कविता का विषय बनाया। जब तक प्रकृति रहेगी धरती पर मानव सभ्यता रहेगी कवियों में चातक प्यास रहेगी तब तक बादल कविता में आलम्बन और उद्‌दीपन बनते रहेंगे।

Tuesday, 18 May 2010

एक बुरुंश कहीं खिलता है

हरीश चन्द्र पाण्डे (जन्म २८-१२-५२)
आवास- ए-११४, गोविन्दपुर कालोनी, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- ०९४५५६२३१७६ (09455623176)

समकालीन हिन्दी कविता में हरीश चन्द्र पाण्डे एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अस्सी के दशक में समकालीन कविता में जिन महत्वपूर्ण कवियों ने पहचान बनायी उसमें हरीश चन्द्र पाण्डे का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) की सुरम्य पहाडि यों ने हिन्दी साहित्य और देश को कई महत्वपूर्ण साहित्यकार दिये हैं जिनमें प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत, इलाचन्द्र जोशी, गौरापंत शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी, पंकज बिष्ट और मृणाल पाण्डे प्रमुख हैं। बुरुंश के खूबसूरत और चटख रंगों वाली शांत और सुरम्य अल्मोड़ा घाटी में (सदी गांव द्वारा हाट) २८-१२-१९५२ को हरीश चन्द्र पाण्डे का जन्म हुआ। पाण्डे जी की स्कूली शिक्षा अल्मोड़ा और पिथौरागढ  में हुई और कामर्स में स्नातकोत्तर की शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश से पूर्ण हुई। हरिशचन्द्र पाण्डे की कविताएं देश की खयातिलब्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पाण्डे जी की कविताओं में कन्टेन्ट की ताजगी और कहन की शैली दोनों स्तरीय होते हैं। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है यथा- अंग्रेजी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी तथा उर्दू। अब तक हरीश चन्द्र पाण्डे को सोमदत्त पुरस्कार (१९९९), केदार सम्मान (२००१), ऋतुराज सम्मान (२००४), हरिनारायण व्यास सम्मान (२००६) आदि कई महत्वपूर्ण सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। पाण्डे जी की महत्वपूर्ण काव्य कृतियां हैं - ''कुछ भी मिथ्या नहीं है'', ''एक बुरुंश कहीं खिलता है'', ''भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं'' और 'असहमति (प्रकाशनाधीन)। स्वभाव से सहज और सौम्य व्यक्तित्व के धनी कवि हरीश चन्द्र पाण्डे सम्प्रति महालेखाकार कार्यालय इलाहाबाद में वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। हम इस कवि की दो कविताएं अपने सभी पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं -



एक बुरूंश कहीं खिलता है

खून को अपना रंग दिया है बुरूंश ने

बुरूंश ने सिखाया है
फेफड़ों में भरपूर हवा भर कर
कैसे हंसा जाता है

कैसे लड़ा जाता है
ऊंचाई की हदों पर
ठन्डे मौसम के विरुद्ध

एक बुरूंश कहीं खिलता है
खबर
पूरे जंगल में आग की तरह फैल जाती है

आ गया है बुरूंश
पेड़ो में अलख जगा रहा है
उजास और पराक्रम के बीज बो रहा है
कोटरों में

बुरूंश आ गया है
जंगल के भीतर एक नया मौसम आ रहा है


२- देवता

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इन्कार कर दिया

आदमी ने उसे
देवता बना दिया

Sunday, 9 May 2010

एक गीत -मां तुम गंगाजल होती हो

एक गीत -माँ तुम गंगाजल होती हो 
मेरी ही यादों में खोयी
अक्सर तुम पागल होती हो
मां तुम गंगा जल होती हो!
मां तुम गंगा जल होती हो!

जीवन भर दुःख के पहाड़ पर
तुम पीती आंसू के सागर
फिर भी महकाती फूलों सा
मन का सूना सा संवत्सर
जब-जब हम लय गति से भटकें
तब-तब तुम मादल होती हो।

व्रत, उत्सव, मेले की गणना
कभी न तुम भूला करती हो
सम्बन्धों की डोर पकड  कर
आजीवन झूला करती हो
तुम कार्तिक की धुली चांदनी से
ज्यादा निर्मल होती हो।

पल-पल जगती सी आंखों में
मेरी खातिर स्वप्न सजाती
अपनी उमर हमें देने को
मंदिर में घंटियां बजाती
जब-जब ये आंखें धुंधलाती
तब-तब तुम काजल होती हो।

हम तो नहीं भगीरथ जैसे
कैसे सिर से कर्ज उतारें
तुम तो खुद ही गंगाजल हो
तुमको हम किस जल से तारें।
तुझ पर फूल चढ़ायें कैसे
तुम तो स्वयं कमल होती हो।

Friday, 7 May 2010

गजल : वो एक खत है

चित्र -गूगल से साभार 


एक गज़ल -वो चुप रहे खुदा की तरह 

उसी के कदमों की आहट सुनाई देती है
कभी-कभार वो छत पर दिखाई देती है

मैं उससे बोलूं तो वो चुप रहे खुदा की तरह
मैं चुप रहूं तो खुदा की दुहाई देती है

वो एक खत है जिसे मैं छिपाये फिरता हूं
जहां खुलूस की स्याही दिखाई देती है

तमाम उम्र उंगलियां मैं जिसकी छू न सका
वो चूड़ी वाले को अपनी कलाई देती है

वो एक बच्ची खिलौनों को तोड  कर सारे
बड़े सलीके से मां को सफाई देती है

जयकृष्ण राय तुषार

Saturday, 1 May 2010

'गांव गया था गांव से भागा' - कवि कैलाश गौतम

कैलाश गौतम 
[08-01-1944-09-12-06]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भा
ग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का 09 दिसम्बर 2006 को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। 08 जनवरी 1944 को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड़ी , बिना कान का आदमी , प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि ५.०० लाख रुपये) से इस कवि को सम्मानित किया। अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम की कविता ''गांव गया था गांव से भागा'' हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय / राष्ट्रीय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं-
गाँव गया था गाँव से भागा 
गांव गया था
गांव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
 सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम रहीम देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएं-कुएं में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये नये हथियार देखकर
लहू-लहू त्यौहार देखकर
झूठ की जै-जैकार देखकर
सच पर पड ती मार देखकर
भगतिन का श्रृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
मुठ्‌ठी में कानून देखकर
किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर
गंजे को नाखून देखकर
उजबक अफलातून देखकर
पंडित का सैलून देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

(साभार - 'सिर पर आग' से आशु प्रकाशन इलाहाबाद)

एक मौसमी गीत-होठों पे गीत लिए रोपेंगे धान

चित्र साभार गूगल एक गीत- होठों पे  गीत लिए रोपेंगे धान । धानों के साथ हरे होंगे ये पान । फूलों पर खुश होगी तितली की रानी, रिमझिम बरसो बादल ख...